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दिल्ली हाईकोर्ट ने दिल्ली के प्राधिकरणों की कार्यप्रणाली पर सख्त टिप्पणी की है। हाईकोर्ट ने निगमों की खिंचाई करते हुए कहा है कि अगर यह प्राधिकरण अपनी आंखें खुली रखते तो देश की राजधानी एक प्रदूषित शहर नहीं बनता। यहां के अस्पतालों में कम मरीज़ होते।

दिल्ली हाईकोर्ट की कार्यवाहक चीफ जस्टिस गीता मित्तल और जस्टिस सी. हरिशंकर की बेंच ने रिहाईशी और नॉन-कंफर्मिंग इलाकों में औद्योगिक इकाइयों को इजाज़त देने के मामले में नगर निगम अफसरों की मिलीभगत पर नाराज़गी जताई।

बेंच ने दिल्ली के तीनों नगर निगमों को जांच करने और कोर्ट को औद्योगिक इकाइयों की पूरी जानकारी 19 फरवरी से पहले देने का निर्देश दिया है। निगम यह भी बताएगें कि किस इलाके में कितनी औद्योगिक इकाइयां हैं।

दिल्ली हाईकोर्ट में बवाना फैक्ट्री वेलफेयर एसोसिएशन ने एक याचिका दायर की है जिसमें औद्योगिक इकाइयों को रिहाईशी इलाके से दूसरे स्थान पर भेजने में प्राधिकरणों की विफलता की बात कही गई है। याचिका में इस बात का भी ज़िक्र है कि औद्योगिक क्षेत्रों में उद्योगों को आवंटित की गई ज़मीन का कोई इस्तेमाल नहीं किया गया है और फैक्ट्रियां दूसरे इलाकों में काम कर रहीं हैं।

हाईकोर्ट ने दिल्ली राज्य औद्योगिक एवं बुनियादी ढांचा निगम लिमिटेड (DSIIDC) को 1706 औद्योगिक इकाइयों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने, या फिर उन्हें दूसरी जगह शिफ्ट करने का भी निर्देश दिया है।

बेंच ने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस अदालत में अनधिकृत निर्माणों को लेकर याचिकाओं की बाढ़ आ गई है और सभी शिकायतें नगर निगमों की स्टेटस रिपोर्टस में सही साबित हो रही हैं। यह नगर निगमों के अधिकारियों की गंभीर लापरवाही दर्शाता है।

हाईकोर्ट ने पूर्वी दिल्ली नगर निगम को उसके अंतर्गत आने वाले इलाके में हुए अवैध निर्माणों का सर्वेक्षण करने और उन पर कानून के अनुसार कार्रवाई करने का निर्देश भी दिया। बेंच ने कार्रवाई की स्टेटस रिपोर्ट भी पेश करने को कहा है।

दिल्ली हाईकोर्ट में मामले पर अगली सुनवाई 4 अप्रैल 2018 को होगी।

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