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भूषण स्टील के मामले में अदालत के अंदर इतिहास बनने जा रहा है। कंपनी की कथित गड़बड़ियों की जांच करते हुए सीरियस फ्रॉड इन्वेस्टिगेशन ऑफिस (एसएफआईओ) ने 70 हजार पन्नों की चार्जशीट में 284 लोगों और इकाइयों को आरोपी बनाया है।

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि इस विशाल चार्जशीट को देखते हुए अदालत को सभी आरोपियों की अटेंडेंस दर्ज करने में ही 4 घंटे 45 मिनट लग सकते हैं और सुनवाई ऐसी अदालत में करनी पड़ सकती है जहां आरोपी और उनके वकील मिलाकर करीब 600 लोग आ सकते हों।

जज को 70 हजार पन्ने में दर्ज सबूतों पर नजर डालनी पड़ सकती है। किसी भी क्रिमिनल केस में चार्जशीट फाइल होने और उसका संज्ञान लिए जाने के बाद आरोप तय करने के साथ सुनवाई की शुरुआत होती है।

हालांकि उससे पहले कोर्ट को अपने सामने लंबित दूसरी याचिकाओं का निपटारा करना होता है, जिनमें आरोपियों के बेल या डिस्चार्ज ऐप्लिकेशंस हो सकते हैं। आर्थिक अपराध के मामलों में यह भी तय करना होता है कि किन प्रॉपर्टीज को अटैच किया जाना है।

भूषण स्टील मामले में कुछ आरोपियों की पैरवी कर रहे सीनियर वकील विजय अग्रवाल ने कहा, ‘एजेंसी ने इतने ज्यादा आरोपियों के नाम डाले हैं कि हो सकता है कि मौजूदा वकीलों और आरोपियों के जीवन काल में सुनवाई पूरी न हो पाए।’

ऐसे में सुनवाई कोर्ट रूम में नहीं हो सकती। कोई दूसरी जगह देखनी होगी। सीआरपीसी के सेक्शन 207 के अनुसार हर आरोपी को चार्जशीट की हार्ड कॉपी देनी होती है। ऐसे में एजेंसी को दो करोड़ से ज्यादा पेज प्रिंट कराने होंगे।’

बड़ी संख्या में आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट पेश करने का एसएफआईओ का निर्णय सुप्रीम कोर्ट की इन गाइडलाइंस पर आधारित है कि कथित अपराध में शामिल सभी लोगों पर आरोप लगाए जाएं। इसके बाद कोर्ट तय करता है कि किनके खिलाफ सुनवाई होगी।

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