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किसान राजनीति लिए चर्चित रहे मुजफ्फरनगर में साल 2013 में हुए मुजफ्फरनगर दंगे ने यहां की सियासत को नया मोड़ दे दिया। पिछले करीब 6 सालों में ध्रुवीकरण के चरम पर पहुंचे मुजफ्फरनगर में 2019 के चुनाव में विपक्ष ने बीजेपी को रोकने के लिए जातिवाद का ब्रह्मास्त्र चलाया है। समाजवादी पार्टी, बीएसपी और आरएलडी के गठबंधन ने अजित सिंह को अपना प्रत्याशी बनाया है।

अजित सिंह को समर्थन देते हुए कांग्रेस ने यहां से अपने प्रत्याशी को नहीं उतारा है। अजित सिंह अपनी परंपरागत सीट बागपत छोड़ कर पहली बार मुजफ्फरनगर से चुनाव लड़ रहे है। जबकि बीजेपी ने इस बार भी अपने वर्तमान सांसद संजीब बालियान पर ही दांव लगाया है। यानि मुजफ्फरनगर में इस बार मुख्य मुकाबला बीजेपी और गठबंधन की सेना के बीच है।

2019 के चुनाव में वोट बटोरने के लिए एक बार फिर से मुजफ्फरनगर दंगे के जख्म को कुरेदने की कोशिश बीजेपी और गठबंधन दोनों ओर से हो रही है। विपक्ष का जोर मुस्लिम-दलित एकजुटता को वोट में बदलने के साथ जाट वोटरों में सेंध लगाने की है। पूर्व प्रधानमंत्री चरण सिंह के विरासत के नाम पर उनके बेटे अजित सिंह यहां की जनता से वोट मांग रहे है तो मुस्लिमों और दलितों के बीच बीजेपी का भय दिखा कर चुनावी माहौल गर्माया जा रहा है। वही बीजेपी को प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता और अपने प्रत्याशी संजीव बालियान का संसदीय क्षेत्र में सक्रियता से मिलने वाले फायदे पर भरोसा है। बीजेपी बाहरी और स्थानीय जैसे मुद्दे को उठा कर विपक्ष की एकता को कमजोर करने की कोशिश में लगी है।

इन तमाम राजनीतिक समीकरणों के बीच 11 अप्रैल को मुजफ्फरनगर के 16,85,954 वोटर अपने वोट के अधिकार का प्रयोग करेंगे। जिसमें पुरूष मतदाताओं की संख्या 9,12,745 है जबकि महिला वोटरों की तादाद 7,72,733 है। इनमें इस बार 25,816 नए मतदाता जुड़े हैं। मुजफ्फरनगर संसदीय क्षेत्र में पांच विधानसभा है जिसमें बुढ़ाना, चरथावल, खतौली , सरधना और मुजफ्फरनगर सदर विधानसभा शामिल है। 2017 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में यहां की पांचों विधानसभा सीटों पर बीजेपी ने जीत हासिल की थी। मुजफ्फरनगर में 2014 का चुनाव परिणाम भी पूरी तरह से ऐतिहासिक रहा था।

इस चुनाव ने मुजफ्फरनगर के पहले चुनाव से लेकर अब तक के जीत के सभी रिकार्ड को ध्वस्त करते हुए डेढ दशक बाद मुजफ्फरनगर संसदीय सीट पर भगवा परचम लहराया था। मुजफ्फरनगर सीट पर बीजेपी के प्रत्याशी डा. संजीव बालियान ऐतिहासिक जीत दर्ज करते हुए सांसद बने थे। 2014 के चुनाव में संजीव बालियान को 6,53,391 वोट मिले थे और उन्होंने अपने निकटतम प्रतिद्वंदी बीएसपी के कादिर राणा को 4,01,150 मतों के अंतर से पराजित कर इतिहास रचा था। 2014 के चुनाव में बीएसपी के कादिर राणा को 2,52,241 वोट मिले थे जबकि तीसरे स्थान पर रहे समाजवादी पार्टी के वीरेन्द्र सिंह को मात्र 1,60,810 वोट ही मिल सके थे। सबसे बुरा हाल तो कांग्रेस का रहा था। कांग्रेस के पंकज अग्रवाल 12,637 वोट के साथ अपनी जमानत भी नहीं बचा सके थे। इस चुनाव में लोगों ने नोटा का भी प्रयोग किया। नोटा के खाते में 4,739 वोट गए थे।

2014 के लोकसभा चुनाव में संजीव बलियान ने मुजफ्परनगर संसदीय सीट से पहली बार किस्मत आजमाया और मोदी लहर पर सवार होकर बंपर वोट से जीत कर सांसद बने थे। दरअसल साल 2013 में मुजफ्फरनगर दंगे के बाद ही बालियान का एकाएक पार्टी में कद बढ़ता गया। कुटबा में राजनाथ सिंह और नितिन गडकरी की किसान रैली से उन्होंने टिकट मांगने की राह पकड़ी। हालांकि प्रत्याशी बनने की जंग में कई अड़चनें आईं, लेकिन किस्मत ने बालियान का साथ दिया। उन्हें टिकट दिए जाने से जिले के पुराने कद्दावर नेता खफा हो गए थे, क्योंकि बीजेपी में बालियान का लंबा अनुभव नहीं था। इसके बावजूद मोदी लहर में लोकसभा चुनाव लड़े संजीव बालियान ने बीएसपी प्रत्याशी कादिर राना को हराकर बड़े अंतर से जीत दर्ज की थी।

हैरत की बात ये थी कि बालियान का राजनीति में यह पहला कदम था। 2014 में जीत भी मिली और केंद्रीय मंत्री पद से भी नवाजे गए। ये तब हुआ, जब इस इलाके से कई कद्दावर नेता, मंत्री पद की दौड़ में थे। जाट बेल्ट में उन्हें कृषि मंत्रालय में राज्यमंत्री का दायित्व मिला, जिसे उन्होंने बखूबी निभाया। बाद में सरकार की नमामि गंगे की महत्वपूर्ण योजना में बालियान को जल संसाधन एवं नदी विकास राज्यमंत्री बनाया गया। हालांकि मोदी मंत्रिमंडल के फेरबदल में उन्हें मंत्री पद छोड़ना पड़ा और उनकी जगह जाट नेता के तौर पर बागपत सांसद डॉ. सत्यपाल सिंह को मंत्रीमंडल में शामिल किया गया। अब जबकि एक बार फिर से बीजेपी के संजीव बालियान चुनावी मैदान में है और उनके सामने गठबंधन सेना के साथ अजित सिंह ताल ठोंक रहे हैं तो सबकी नजर वोटरों पर है। क्योंकि लोकतंत्र में आखिरी फैसला तो जनता का ही होता है।

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