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दुनियां के लिये जीते थे किसी को कोई शिकायत न थी,

अपने लिए जीने का क्या सोचा सारा ज़माना ही दुश्मन हो गया।

ये पंक्तिया एक दम सटीक बैठती है बीजेपी के अभिभावक के तौर पर देखे जाने वाले वरिष्ठ बीजेपी नेता लाल कृष्ण आडवानी पर जिन्होने तिनका-तिनका जोड़ कर पार्टी के लिए जिया, लेकिन जब पेड़ पौधा देने वाला हुआ तो माली को ही पराया कर दिया गया, लाल कृष्ण आडवाणी भारतीय राजनीति तो क्या भारतीय जनता पार्टी की राजनीति में आप्रासंगिक से हो गए हैं। आडवाणी का रजनीतिक जीवन संघर्षों से भरा रहा है, लेकिन वो प्रधानमंत्री की कुर्सी तक नहीं पहुंच पाए। आख़िर उनकी राजनीति कहां हो गई चूक ?

ये वही आडवाणी हैं जिन्होंने 1984 में दो सीटों पर सिमट गई, उस वक्त आडवानी की ही दूर दृष्टी भरी नज़र थी की देश को एक मजबूत हिन्दू संगठन को बनाये जाने की जरूरत है, बस वही से भारतीय जनता पार्टी को रसातल से निकाल कर पहले भारतीय राजनीति के केंद्र में पहुंचाया और फिर 1998 में पहली बार सत्ता का स्वाद चखाया। एक ज़माने में भारतीय जनता पार्टी के वयोवृद्ध नेता लाल कृष्ण आडवाणी की पूरे भारत में तूती बोला करती थी और उन्हें प्रधानमंत्री पद का प्रबल दावेदार माना जाता था। लेकिन 2004 और 2009 की लगातार दो चुनाव की हार के बाद ‘लॉ ऑफ़ डिमिनिशिंग रिटर्न्स’ का सिद्धांत आडवाणी पर भी लागू हुआ और एक ज़माने में उनकी छत्रछाया में पलने वाले नरेंद्र मोदी ने उनकी जगह ले ली।

दावेदारी थी प्रबल…

1994-95 के आडवाणी को देखें तो वो भी प्रधानमंत्री के रूप में बीजेपी के स्वाभाविक उम्मीदवार थे लेकिन वस्तुस्थिति का जितना अंदाज़ा आडवाणी को था, उतना बाकी लोगों को नहीं था। “वो जानते थे कि भारत जैसे देश में उन दिनों के हालात में एक ऐसे शख्स की ज़रूरत है जिसके बारे में सबका मत एक हो। इसको नज़र में रखते हुए ही उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी का नाम आगे किया।

2014 में बनना चाहते थे प्रधानमंत्री….

मई, 2014 में भाजपा को पहली बार अपने बूते केंद्र में सरकार बनाने का बहुमत मिल गया। इसके बावजूद लालकृष्ण आडवाणी ने पार्टी सांसदों के एक कार्यक्रम में कह दिया कि इस बात की समीक्षा करनी होगी कि इस जीत के लिए किसी व्यक्ति के पक्ष में बनी लहर जिम्मेदार है या फिर कांग्रेस की अगुवाई वाली सरकार के खिलाफ लोगों में पनपा गुस्सा। जबकी इसके पहले हुयी बैठक में मोदी ने अस्वस्थ होने का बहाना बना कर बैठक में आने से मना कर दिया था, जिसके बाद दोनों नेताओं में तल्खिया बढ़ने की बाते आम होनी शुरु हो चुकी थी। वही दूसरी बैठक में हाजिर होने पर जब नरेंद्र मोदी के बोलने का अवसर आया तो उन्होंने अपने अंदाज में आडवानी के बयान का प्रतिवाद किया था।

296 दिनों में 365 शब्द…

पिछले पांच साल के दौरान लालकृष्ण आडवाणी संसद में 296 दिन उपस्थित रहे, लेकिन बोले कुल मिलाकर सिर्फ 365 शब्द। सदन में सबसे आगे की कतार में बैठने वाले और भाजपा के प्रखर वक्ताओं में गिने जाने वाले इस दिग्गज के बारे में कभी किसी ने शायद ही यह सोचा हो।

और अब…

वही अब होली के दिन बीजेपी के लोकसभा चुनाव 2019 के पहले 184 उम्मीदवारी की लिस्ट में लाल कृष्ण आडवानी की 2014 की लोकसभा सीट गांधीनगर से अमित शाह को टिकट मिलना सब की समझ के बाहर है।

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