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चौतरफा कूटनीतिक दबाव के चलते पाकिस्तान ने जैश सरगना मसूद अजहर के दो भाई समेत 44 आतंकवादियों को हिरासत में लेने के कुछ ही घंटे के भीतर पाकिस्तान ने जमात-उद-दावा और फलाह-ए-इन्सानियत फाउंडेशन पर बैन लगा दिया है। दिलचस्प बात यह है कि 4 मार्च को ही पाकिस्तान ने JUD को वॉच लिस्ट में रखा था, लेकिन एक दिन के भीतर ही उसे बैन कर दिया।

मुंबई हमले के गुनहगार आतंकी हाफिज सईद के इन दोनों संगठनों पर से कुछ दिन पहले ही बैन हटाया गया था। हाफिज सईद इन दोनों संगठनों के जरिए करीब 300 धार्मिक शिक्षण संस्थान और स्कूल, अस्पताल, पब्लिशिंग हाउस और एंबुलेंस सर्विस चलाता है। पाकिस्तान में इससे पहले भी कई बार JUD पर बैन की कार्रवाई होती रही है, लेकिन कई बार वो सरकार के फैसले के खिलाफ कोर्ट जा चुका है।

हाफिज सईद को संयुक्त राष्ट्र ने आतंकी घोषित करते हुए उस पर 10 मिलियन डॉलर के इनाम का ऐलान किया था। 2012 में लश्कर पर बैन लगाया गया था। उसके बाद हाफिज ने अपनी आतंकी गतिविधि चलाने के लिए जमात उद दावा और फलाह ए इन्सानियत फाउंडेशन बनाया और इनकी आड़ में अपने नापाक मंसूबों को अंजाम देता रहा।

पाकिस्तान की जमीन पर ऐसी आतंकी गतिविधियों को बढ़ावा देने के चलते अमेरिका और यूरोपियन देशों के फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) ने इस पड़ोसी मुल्क को अपनी ग्रे लिस्ट में डाल दिया था। बीते दिनों FATF की बैठक से पहले खबर आई थी कि पाकिस्तान ने मोस्ट वांटेड आतंकी हाफिज़ सईद के संगठन जमात-उद-दावा पर बैन लगाया है, वह झूठी थी। जो लिस्ट सामने आई थी, उससे खुलासा हुआ था कि पाकिस्तान की सरकार ने इस संगठन पर बैन नहीं लगाया है, बल्कि सिर्फ इन पर निगरानी रखने की बात कही है।

बता दें इस कार्रवाई के पीछे पाकिस्तान की कई तरह की मजबूरियां हैं। पहली तो ये कि पुलवामा आतंकी हमले के बाद भारत ने कूटनीतिक तौर पर उसे दुनियाभर में ऐसा घेरा कि हर बड़े देश ने उसकी आलोचना की। जिसके बाद से ही उसपर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के सामने खुद को साबित करने की चुनौती है।

क्योंकि अगर UNSC जैश जैसे संगठन पर बैन लगाता है तो पाकिस्तान के लिए कार्रवाई करना जरूरी होता और कई अन्य एजेंसियों का भी दबाव उस पर बनता। यही कारण है कि 13 मार्च को होने वाली UNSC की महाबैठक से पहले पाकिस्तान ने इस तरह का एक्शन लिया है। जिस पर विश्वास करना काफी मुश्किल है।

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