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~पल्लवी सिंह 

रोहिंग्या होना म्यांमार में एक जुर्म सा है। म्यांमार में रोहिंग्या पर हो रहे हिंसा के कारण वे वहां से पलायन कर रहे हैं। ऐसी त्रासदी में अक्सर औरतों और बच्चे सबसे ज्यादा त्रस्त होते हैं। धोती-टी शर्ट पहने पीले रंग का ड्रम पकड़े खड़ा नबी अंतरराष्ट्रीय मीडिया में इस त्रासदी का प्रतीक बनता जा रहा है। नबी हुसैन जिंदा बचने के लिए नदी में प्लास्टिक की केन पकड़कर म्यांमार से बांग्लादेश आया है।

दरअसल यह नबी हुसैन 13 साल का एक रोहिंग्या लड़का है जो म्यांमार से अपने गांव और मां-बाप को छोड़ कर भाग आया है। खास बात यह है कि नबी को तैरने नहीं आता था और यहां  से भागने के लिए उसे नाफ नदी  पार करनी थी। ऐसे में उसने एक छोटे से पीले रंग के ड्रम का सहारा लिया और इसके जरिए पांच किमी तक तैरकर नदी पार की और जान बचाकर बांग्लादेश के शाह पुरीर द्वीप आया।

नबी कहता है कि “म्यांमार में रहता तो मारा जाता। मैं मरना नहीं चाहता था, इसलिए बस किसी भी तरह यहां से भागना था। मुझे तैरना नहीं आता था। इसलिए ड्रम का सहारा लिया और नदी पार की।” हालांकि नबी ने ही ये काम अकेले नहीं किया है बल्कि उसके साथ उसके दो दोस्त 18 साल का कमाल हुसैन और 19 साल का अब्दुल करीम भी हैं जिन्होंने इसी तरह नदी को पार कर बांग्लादेश आ अपनी जान बचाई है।

Rohingya situation

नदी पार करके बांग्लादेश आए नबी को अब कुछ नहीं चाहिए सिवाए मां-बाप और शांति के। वो बताता है कि “इससे पहले कभी नदी या समुद्र कभी देखा भी नहीं था। जब नदी पार करने की बारी आई, तो मुझे लगा कि ये मेरी जिंदगी का आखिरी दिन होगा। लेकिन घर में चार दिन से खाना नहीं मिला था। इसलिए मैंने मां से कहा कि मैं तैरकर उस पार करने जा रहा हूं।’ नबी के माता-पिता अभी भी म्यांमार में ही हैं। वहीं नबी की तरह ही कमाल कहता है कि हमने सोचा कि यहां जो कुछ भी झेल रहे हैं, उससे तो बेहतर ही होगा कि डूब जाएं और अगर हम नदी पार कर ले गए तो जिंदगी बच जाएगी।

Rohingya refugee

नबी की कहानी जान कर अब बस यही लगता है कि यह मानव सभ्यता न जाने किस त्रासदी की ओर जा रही है, जहां भावनाएं नदारद और संवेदनाएं शून्य होती जा रही हैं।

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