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फतेहपुर: गणतंत्र के 69 सालों बाद भी देश में स्वास्थ्य व्यवस्थाएं पहुंच वालों को ही नसीब हैं। विकास के बड़े-बड़े दावों के बीच गरीबी की मार जो न कराए। कभी कोई दाना मांझी बनने को मजबूर है तो, कोई अपने बच्चे की लाश कंधों पर ढोने को विवश है।

चारपाई पर यूपी की स्वास्थ्य व्यवस्था भले न हो लेकिन चार पैरों की एंबुलेंस भी मरीजों का मुंह देखकर दी जाती हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि यूपी में गायों के लिए तो एंबुलेंस सेवा की शुरुआत जरुर हुई लेकिन गरीब मरीजों को एंबुलेंस मिलना दूभर हो गया है। इसी महीने कानपुर देहात जिले में सड़क हादसे में एक मासूम अपने रिश्तेदार के कंधे पर तड़पकर मर गया, लेकिन ऐंबुलेंस नहीं आई। पीड़ित परिवार को कंधे पर ही शव रख कर पोस्टमॉर्टम हाउस ले जाने की नौबत आई। ताजा मामला फतेहपुर के नेशनल हाईवे इलाके के कल्याणपुर थाने के कल्याणपुर गांव का है। जहां सड़क हादसे में गंभीर रुप से घायल बुजुर्ग को परिजनों ने इलाज के लिए अस्पताल ले जाने के लिए 108 एंबुलेंस सेवा को फोन किया। लेकिन जब एंबुलेस नहीं आई। तो पीड़ित बेटी और बेटों ने चारपाई को ही एंबुलेंस बना लिया और चक्के की जहग अपने कंधों पर लादकर करीब 2 किलोमीटर पैदल चलकर अस्पताल पहुंचे। इलाज कराने के बाद भी इन्हें एंबुलेंस नसीब नहीं हुई। ऐसे में फिर दोबारा चारपाई पर लादकर वापस लेकर अपने गांव पहुंचे। फतेहपुर के नेशनल हाईवे इलाके में एंबुलेंस वाले नहीं आते।

तस्वीर अपने आप में ये बताने को काफी हैं कि आखिर सूबे में योगी सरकार स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर कितनी संजीदा है। और अधिकारी हैं कि कुछ बोलने तक को तैयार नहीं हैं। ऐसे में सवाल यही कि, कब तक कोई गरीब अपने बच्चे की लाश कंधे पर ढोने को मजबूर होता रहेगा। कब तक चारपाई को एंबुलेंस बनाती रहेंगी बेटियां।

-ब्यूरो रिपोर्ट एपीएन फतेहपुर

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