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पिता के इस्तीफे के बाद बेटी Radhika Rupani का सोशल मीडिया पर छलका दर्द, पूछा- “राजनीति में शालीनता नहीं रखनी चाहिए?”

गुजरात के मुख्यमंत्री (Gujrat Chief Minister) पद से विजय रूपाणी (Vijay Rupani) ने इस्तीफा दे दिया है। गुजरात के नए सीएम के तौर पर अब भूपेंद्र पेटल (Bhupendra Patel) कार्यभार संभाल रहे हैं। रूपाणी के इस्तीफे (Rupani Resignation) के बाद उनके कार्यकाल पर काफी सवाल खड़ा किया गया। मीडिया में इस्तीफे का कारण बताते हुए कहा गया कि, रूपाणी सरकार कोरोना काल (Corona Pandemic) में फेल  हो गई थी, कांग्रेस प्रदेश में मजबूत हो रही थी इसी तरह रूपाणी के इस्तीफे को बयां किया जा रहा था। इस पर विजय रूपाणी की बेटी राधिका रूपाणी (Radhika Rupani) का दर्द छलका है। उन्होंने फेसबुक पोस्ट (Facebook Post) लिखकर मीडिया और समाज से कई सवाल किए हैं।

राधिका रूपाणी अपने फेसबुक पोस्ट में लिखती हैं….बेटी की नजर में विजय रूपाणी

राधिका रूपाणी ने पोस्ट लिखने के साथ बचन की तस्वीरों को भी फेसबुक पर साझा किया है।

कल कई राजनीतिक जानकारों ने विजय भाई के कार्यकाल को लेकर चर्चा की, उनका बहुत ही आभार..

उनके अनुसार पिता जी का कार्यकाल एक कार्यकर्ता से शुरु हुआ और फिर अध्यक्ष, महापौर, राज्यसभा सदस्य, पर्यटन के अध्यक्ष, बीजेपी के अध्यक्ष और मुख्यमंत्री आदी तक सीमित है लेकिन मेरी नजर में पापा का कार्यकाल 1979 में मोरबी, अमरेली अतिवृष्टि, कच्छ भूकंप, स्वामीनारायण मंदिर आतंकी हमला, गोधरा कांड, बनासकांठा की ओवरराइट, टुट, कोरोना में भी पापा अपनी जनता के साथ खड़े हैं।

कच्छ भूकंप से जुड़ी यादों को साझा किया

राधिका रूपाणी लिखती हैं, आज भी मुझे याद है कच्छ भूकंप के दौरान मेरे भाई ऋषभ को स्कूल मेंबर के साथ घर भेजा गया था और वो खुद भूकंप पीड़ितों की मदद करने के लिए राजकोट के लिए रवाना हो गए थे। भतीजे की शादी प्राथमिकता न मानते हुए भूकंप के दूसरे दिन भचाऊ का प्रभारी घोषित किया।

वे आगे कहती हैं, एक दिन मुझे और मेरे भाई को साथ लेकर भूकंप की हकीकत समझाकर राहत कोष में लोगों के साथ बैठाया।

राधिका ने यहां पर कुछ बचपन की यादों का भी जिक्र किया है

वो कहती हैं, बचपन में हमने कभी रेसकोर्स शिफ्ट या थिएटर में रविवार का आनंद नहीं लिया। घर में बस इतना ही रिवाज था कि हम किसी बीजेपी कार्यकर्ता के घर जा सकते हैं। वो भी माता पिता अपने साथ लेकर जाया करते थे। स्वामीनारायण मंदिर के आतंकी हमले के दौरान मोदीजी के प्रांगण जाने से पहले मेरे पिताजी ने वहां का दौरा किया।

पिता जी वहां पर अकेले नहीं गए थे, मुझे भी साथ लेकर गए थे ताकि हम लोक संवाद का अनुभ कर सके। यह बात बहुत ही कम लोगों को पता है कि, टौटे और कोरा के महासंकट के समय रात 2.30 बजे तक जागकर पिताजी ने फोन से सारा इंतजाम किया था। जन और जनसेवा ही उनका मंत्र है।

सालों से हमारे घर में सरल सा प्रोटोकॉल था।

अगर किसी का फोन आए तो विनम्रता से बात करें।

कोई भी व्यक्ति घर पर कभी भी आता है, पिताजी मौजूद हो या ना हो चाय नाश्ता जरूर कराते थे।

सरल पोशाक के साथ सरल स्वाभाव भी रखने के लिए पिताजी ने सिखाया था।

पिताजी ने मूलमंत्र दिया था पहले सीखना और फिर मजा।

हमारी शिक्षा में माता पिता का बड़ा योगदान था, घर में  पेशेवर और मास्टर डिग्री जरूरी थी। पढ़ाई के बाद ही आगे कमद उठाने और अन्य काम को करने की अनुमति थी। आज हम दोनों भाई बहन अपने खेत में बसे हैं हम धरती पर हैं इस संस्कार का श्रेय माता पिता को ही जाता है।

आज भी याद है राजकोट में पिताजी के साथ सड़क पर स्कूटर पर जाना और सड़क पर कहीं दुर्घटना या झगड़ा हो तो पिता जी स्कूटर को खड़ाकर भीड़ के बीच झगड़ा सुलझाने के लिए चले जाते थे।

लोगों की मदद करने की स्पष्ट सोच उनकी जन्मजात है। यह स्वभाव आज का नहीं है।

कल मैंने एक न्यूज हेडलाइन पढ़ी- विजय भाई की कोमल बोली जाने वाली छवि उनके खिलाफ काम आई। उनसे मैं एक सवाल पूछना चाहती हूं क्या राजनीतिज्ञों को संवेदनशीलता, शालीनता नहीं रखनी चाहिए?  क्या यह एक आवश्यक गुणवत्ता नहीं है जिसे हमें एक नेता में चाहिए? कोमल बोली जाने वाली छवि एक ऐसी व्यक्तित्व है जिससे समाज के सभी स्तर के लोग आसानी से आकर मिल सकते हैं। क्या है जरूरी नहीं है? जहां बदमाशी या अपराध की बात होती है, वहां उन्होंने सख्त कमद उठाया है। CM डेस्कबोर्ड से लेकर लैंड गार्बिंग एक्ट, लव जिहाद, GUJCOVA, शराबबंदी सबूत है। इतना सब करने के बाद क्या सारा दिन गंभीर और भारी चेहरे के साथ घूमना नेता की निशानी है?

हमारे घर में इस बात की बहुत चर्चा होती रही है कि जब भारतीय राजनीति में इतना भ्रष्टाचार, नकारात्मकता व्याप्त है। तब सरल व्यक्तित्व और सरल स्वभाव – क्या यह जीवित रहेगा? क्या यह पर्याप्त होगा? लेकिन पिताजी ने हमेशा एक ही बात कही है कि राजनीति और नेता की छवि भारतीय फिल्मों और ठगों और स्वार्थी लोगों की तरह सदियों पुरानी धारणा से बनाई गई है, हमें उसी धारणा को बदलना होगा।

पिताजी ने कभी गुटबाजी या बयानबाजी का समर्थन नहीं किया। यही उसकी विशेषता है। कोई भी राजनीतिक विशेषज्ञ जो सोचता है कि विजय भाई का कार्यकाल समाप्त हो गया है। हमारी राय में, उपद्रव या प्रतिरोध के बजाय आरएसएस और भाजपा के सिद्धांतों के अनुसार, सत्ता के लालच के बिना आसानी से पद छोड़ना किसी और चीज से ज्यादा साहसी है !!
जय हिंद, भारतमाता की जय

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