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एक बार फिर जजों की नियुक्ति मामले में कॉलेजियम और केंद्र सरकार आमने-सामने है। इस बार मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट में अतिरिक्त जजों की नियुक्ति का है। केंद्र सरकार ने कॉलेजियम की सिफारिशों से सहमति नहीं जताते हुए उसे रोक डाला है। केंद्र ने दलील दी है कि उम्मीदवारों की वार्षिक पेशेवर आय निर्धारित मानदंडों से कम है।

दरअसल, जब बार के किसी उम्मीदवार की उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति के लिए सिफारिश की जाती है, तो उस पर विचार करने के लिए यह जरूरी है कि उस व्यक्ति की कम से कम 5 सालों में औसतन 7 लाख रुपये की वार्षिक आय होनी चाहिए। फरवरी में कॉलेजियम ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के अतिरिक्त न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति के लिए कुछ वकीलों के नामों की सिफारिश की थी।

कानून मंत्रालय ने यह पाया है कि 10 उम्मीदवार आय के उन मानदंडों को पूरा नहीं करते हैं, जो मेमोरेंडम ऑफ प्रॉसीजर यानि कि MOP के तहत तय किए गए हैं। दरअसल MOP ही उच्चतर न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति और ट्रांसफर के लिए दस्तावेज है।  सरकार ने अब सिफारिशें रोक लेने का फैसला किया है

वैसे ये पहली बार नहीं है कि सरकार और कॉलेजियम जजों के तबादले और नियुक्ति पर आमने-सामने हुए हों। इससे पहले चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अगुआई वाले सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम ने केंद्र को सुझाव दिया था कि जस्टिस कुरैशी को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस बनाया जाए। सरकार के ना मानने के बाद जस्टिस कुरैशी की नियुक्ति त्रिपुरा हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के तौर पर की गई।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र के रवैये पर आपत्ति भी जताई है। अदालत ने कहा था कि कि न्यायधीशों की नियुक्तियां और तबादले न्यायिक प्रशासन की बुनियादी प्रक्रिया है। वहां न्यायिक समीक्षा पूरी तरह से प्रतिबंधित है। सिस्टम में किसी भी तरह का हस्तक्षेप इस संस्थान को बेहतर ढंग से कार्य नहीं करने देगा।

सवाल ये उठता है कि आखिर कॉलेजियम स्थापित मापदंढ़ों के आधार पर क्यों कार्य नहीं करता है। वह सरकार को अपने फैसलों को पलट देने का मौका क्यों देता है।

अगर मद्रास हाईकोर्ट की चीफ जस्टिस वीके तहिलरामानी की बात करे तो उनके मेघालय ट्रांसफर पर भी विवाद हुआ था। ट्रांसफर से नाराज होकर उन्होंने इस्तीफा दे दिया था। जब हो हल्ला हुआ तो सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वे अपने फैसले के पीछे का कारण साफ कर सकते हैं। कोर्ट ने कारणों में अदालत में उसके “कम काम के घंटे” की रिपोर्ट; जिस तरीके से उसने “अचानक” एक बेंच को भंग कर दिया; राज्य के सत्तारूढ़ दल के एक वरिष्ठ राजनेता के साथ उनकी कथित निकटता; और चेन्नई में उसकी दो संपत्तियों की खरीद का हवाला दिया।

इस फैसले पर सवाल सुप्रीम कोर्ट के एक जज ने ही उठाया है। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ ने कहा कि न्यायाधीशों का स्थानांतरण, उनके खिलाफ शिकायतों का समाधान नहीं है। जाहिर है कि कॉलेजियम के कार्यप्रणाली से उच्चतम न्यायालय के जज भी सहमत नहीं हैं। ऐसे में सरकार पर ही उंगली कैसे उठाई जाए।

सभी जजों की संपत्ति का पूरा ब्योरा अभी तक सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर नहीं है। फिर संपत्ति क्यों बना है जस्टिस तहिलरामानी के ट्रांसफर का मुद्दा। सवाल ये भी है कि क्या जजों के काम-काज का पूरा ब्योरा सुप्रीम कोर्ट के पास है और क्या किसी नेता से कथित नजदीकियां जज के ट्रांसफर का कारण बन सकता है।

केंद्र सरकार पहले ही कह चुकी है कि वो सुप्रीम कोर्ट की ‘पोस्ट आफिस’’ नहीं है। वह सिफारिशों पर अपने विवेक से काम करेगी। मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में नेशनल ज्यूडिशियल कमीशन की स्थापना के लिए संसद में बिल को मंजूरी दी गई थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर कॉलेजियम सिस्टम ही जारी रखा। अब सरकार को अपने फैसलों में कमी निकालने का मौका देकर कॉलेजियम खुद की व्यवस्था को कमजोर करने में लगी है।

-संजय रमन सिन्हा

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