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बारिश और बाढ़ से हो रही बर्बादी को कुछ लोग आपदा का नाम देकर पीड़ितों के दर्द को हल्का करने में जुटे है। लेकिन क्या आपको पता है कि बाढ़ तो आपदा है, लेकिन उससे होने वाली तबाही कुछ लोगों की साजिश। अब आप सोच रहे होंगे कि ये क्या बात है। बाढ़ आपदा है लेकिन उससे होने वाली तबाही साजिश, ये कैसे हो सकता है?

लेकिन असल में यही सच्चाई है। जानकारी के अभाव में हम लोग हर साल इस साजिश का शिकार होते है और लाखों करोड़ का नुकसान झेलते है। सरकार की तरफ से हल्की फुल्की मदद मिल जाती है और हम लोग अपने जीवन की परेशानियों में उलझकर दोबारा अपने जीवन को पटरी पर लाने की जद्दोजहद में लग जाते है।

अब आपको समझाते है कि ये साजिश कैसे और कौन करता है? ये साजिश हमारे नेता और ब्यूरोक्रेट्स की है। हर साल हम सभी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष टैक्स चुकाते है। सरकार बाढ़ से होने वाली तबाही से निपटने के लिए लंबा चौड़ा बजट बनाती है। लेकिन उस बजट का कुछ हिस्सा ही खर्च किया जाता है और वो भी तब जब हालात बेकाबू हो जाते है।

मीडिया में लोगों के दर्द से जुड़ी खबरें दिखाई जाने लगती है। तब सरकार और प्रशासन दोनों ही राहत और बचाव कार्य का दिखावा कर वाहवाही बटोरने में जुट जाते है। हमें आजाद हुए करीब 75 साल हो चुके है। इन 75 सालों में हर साल जनता बारिश और बाढ़ का दंश झेलती है। लेकिन 21वीं सदी में जहां हम चांद और मंगल ग्रह तक पहुंचने का दम भर रहे है। ऐसे में हम हर साल पैदा होने वाली बाढ़ और बारिश की तबाही से बचाव के लिए ठोस कदम नहीं उठाते।

आपको बता दें कि सरकार की तरफ से जो भी योजनाएं बनायी जाती है। उसे स्थायी समाधान के रुप में ही प्रसारित किया जाता है। फिर उसके निर्माण कार्य के लिए टेंडर जारी करना, उस टेंडर में करप्शन का खेल और अंत में वो निर्माण कार्य सिर्फ दिखावे के लिए ही पूरा करा दिया जाता है।

कई बार तो योजना के तहत कराए गए निर्माण कार्य पहली बारिश ही नहीं झेल पाते। नेता और ब्यूरोक्रेट्स इस योजना की धनराशि को दीमक की तरह चाट जाते है और फिर हर साल बाढ़ और बारिश अपनी विनाशलीला दिखाती है। असल में सरकारी फाइलों में हम बहुत ही आधुनिक है। बाढ़ और बारिश से बचाव के लिए हर साल तैयारी की जाती है। इस तैयारी के लिए जो बजट जारी किया जाता है। वो मंत्री और ब्यूरोक्रेट्स की तिजोरी तक बड़े ही आराम से पहुंच जाता है।

असल में बाढ़ से निपटने की तैयारियां तो दूर शहर और गलियों की नालियों की सफाई भी नहीं की जाती है। आपने देखा होगा कि जब भी पहली बारिश होती है। रिहायशी इलाकों में भी जल जमाव लग जाता है। अंत में कुल मिलाकर हम एक ऐसे समाज में रहते है जो पूरी तरह से भ्रष्टाचार और स्वार्थ से जुड़ा है।

यहां किसी की भलाई के लिए नेताओं और ब्यूरोक्रेट्स में इच्छा शक्ति ही नहीं बची है और इसके जिम्मेदार कोई और नहीं बल्कि हम ही हैं। क्योंकि वोट देते समय तो हम जाति, धर्म, क्षेत्रवाद, पैसा और शराब देखते है। प्रत्याशी के इच्छाशक्ति तो चेक ही नहीं करते है। तो साजिश के जिम्मेदार नेता, ब्यूरोक्रेट्स के अलावा हम खुद भी है।

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