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शिवसेना के संस्थापक बाला साहेब ठाकरे के पोते और उद्धव ठाकरे के पुत्र आदित्य ठाकरे ने राजनीति में ठाकरे परिवार की परंपरा तोड़ दी है। आदित्य ठाकरे ने मुंबई की वर्ली सीट से विधानसभा चुनाव लड़ने का फैसला किया है।

1966 में शिवसेना की स्थापना से लेकर आज तक ठाकरे परिवार का कोई भी सदस्य ना कभी किसी संवैधानिक पद पर रहा औऱ ना ही कभी किसी ने चुनाव लड़ा। 2014 में एक समय ऐसा लगा था कि शिवसेना से अलग होकर महाराष्ट्र नव निर्माण सेना का गठन करने वाले बाला साहेब ठाकरे के भतीजे राज ठाकरे चुनाव लड़े सकते हैं लेकिन ऐन वक्त पर उन्होंने मन बदल लिया। वैसे ठाकरे परिवार हमेशा महाराष्ट्र में राजनीति की एक ताकत बनकर मुख्यमंत्री बनवाता रहा है। शिवसेना का मुख्यमंत्री भी बना और शिवसेना ने समर्थन देकर मुख्यमंत्री बनवाया भी, लेकिन कभी ठाकरे परिवार ने कोई संवैधानिक जिम्मेदारी नहीं ली। लेकिन अब आदित्य ठाकरे इस जिम्मेदारी के लिए तैयार हैं।

माना जा रहा है कि चुनाव लड़ने के लिए आदित्य ठाकरे को पिता उद्धव ठाकरे को मनाना पड़ा। आदित्य ठाकरे की सोच है कि बदलते परिदृश्य में जनता के बीच में रहकर ही उसकी सेवा की जा सकती है। इसके लिए चुनाव लड़ना जरूरी है।

आदित्य मुंबई की वर्ली सीट से चुनाव लड़ेंगे। वर्ली शिवसेना की सुरक्षित मानी जाने वाली सीटों में से एक है। वर्ली से 2014 में शिवसेना के सुनील शिंदे विधायक चुने गए थे। इस बार शिंदे ने वर्ली सीट आदित्य के लिए छोड़ दी है। हाल में सचिन अहीर भी शिवसेना में शामिल हुए हैं। सचिन अहीर का वर्ली में अच्छा प्रभाव है। सचिन 2014 में एनसीपी के टिकट से चुनाव मैदान में थे और उन्हें सुनील शिंदे ने हराया था। अहीर एनसीपी छोड़कर अब शिवसेना में हैं।

शिवसेना आदित्य ठाकरे को भविष्य के मुख्यमंत्री के तौर पर देख रही है। हालांकि शिवसेना नेता संजय राउत ने साफ किया है कि इस बार ही आदित्य मुख्यमंत्री पद की रेस में हैं, उन्हें उप मुख्यमंत्री पद के लिए कतई ना समझा जाए। राउत का ये बयान शिवसेना की सहयोगी बीजेपी की मुश्किलें बढ़ा सकता है। ऐसे में चुनावों के बाद अगर बीजेपी-शिवसेना गठबंधन की जीत होती है तो मुख्यमंत्री पद को लेकर पेंच फंस सकता है। लेकिन इसमें दो राय नहीं कि आदित्य के फैसले से जहां शिवसैनिकों में नई उर्जा का संचार हुआ है तो वहीं बीजेपी सहित दूसरे दलों के लिए ये खतरे की घंटी हो सकती है।

कृष्ण रजित

 

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