भारत के महान धावक “फ्लाइंग सिख” मिल्खा सिंह का शुक्रवार देर रात निधन हो गया। वह कोरोना संक्रमण से जूझ रहे थे। उनका इलाज चंडीगढ़ के पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च में चल रहा था।

उनके परिवार ने एक बयान कहा, “यह अत्यंत दुख के साथ है कि हम आपको सूचित करना चाहते हैं कि मिल्खा सिंह जी का 18 जून 2021 को रात 11.30 बजे निधन हो गया।” बयान में आगे कहा गया है, “उन्होंने बहुत संघर्ष किया लेकिन भगवान के अपने तरीके हैं और यह शायद सच्चा प्यार और साथ था कि हमारी मां निर्मल जी और अब पिताजी दोनों का निधन 5 दिनों के भीतर हो गया।”

91 वर्षीय मिल्खा पिछले 19 मई को कोविड पॉजिटिव पाए गए थे। कुछ दिनों बाद 24 मई को, महान एथलीट को “कोविड निमोनिया” के कारण मोहाली के फोर्टिस अस्पताल के आईसीयू में भर्ती कराया गया था। इसके बाद उन्हें 3 जून को चंडीगढ़ के पीजीआईएमईआर ले जाया गया। पांच दिन पहले ही उनकी पत्नी निर्मल का भी कोरोना संक्रमण के कारण निधन हो गया था।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी उनके निधन पर दुःख व्यक्त करते हुए कहा है ”हमने एक महान खिलाड़ी खो दिया है.”  

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी ट्वीट कर मिल्खा सिंह के निधन पर शोक प्रकट किया है. उन्होंने लिखा है, ”मिल्खा सिंह एक बेहतरीन एथलीट और स्पोर्टिंग लेजेंड थे. उन्होंने अपनी उपलब्धियों से देश को गौरवंतित महसूस कराया था.वह एक शानदार व्यक्ति थे, अपनी अंतिम सांस तक उन्होंने खेल के क्षेत्र में अपना योगदान दिया. उनके निधन की खबर से मैं दुखी हूं. उनके परिवार और प्रशंसकों को संवेदनाएं. ओम शांति.’

खेल मंत्री किरण रिजिजू ने ट्विटर पर मिल्खा सिंह का एक वीडियो साझा करते हुए उनकी आखिरी इच्छा पूरी करने की बात कही है. वीडियो में मिल्खा सिंह कहते नजर आ रहे हैं कि वो चाहते हैं कि भारत का कोई एथलीट ओलंपिक में जाए और गोल्ड मेडल जीते.

पाकिस्तान में इनके आठ भाई बहनों को काट डाला गया

मिल्खा सिंह का जन्म विभाजन से पहले 20 नवंबर, 1929 को पाकिस्तान  में हुआ था। तब उनका गांव गोविंदपुरा मुजफ्फरगढ़ जिले में पड़ता था। राजपूत परिवार में जन्म लेने वाले मिल्खा सिंह के परिवार में माता- पिता के अलावा कुल 12 भाई- बहन थे। लेकिन देश के विभाजन के समय उनके परिवार ने जो त्रासदी झेली वो बेहद खौफनाक थी। पूरा परिवार इस त्रासदी का शिकार हो गया और इस दौरान उनके आठ-भाई बहन और माता पिता को मौत के घाट उतार दिया गया था।

जूते पॉलिश कर किया गुजारा

विभाजन के दौरान किसी तरह मिल्खा सिंह परिवार के जिंदा बचे अन्य तीन लोगों के साथ भागकर भारत पहुंचे। शुरुआत में तो शरणार्थी कैंपों में गुजारा हुआ। बाद में पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के पास जूते पॉलिश करने लगे, तकि कुछ कमाई हो। खाने पीने की किल्लतों के बीच मिल्खा सिंह ने सेना में शामिल होने का फैसला किया और 1951 में वह सेना में शामिल हो गए। इसी एक फैसले ने उनकी पूरी जिंदगी बदली थी। इसी फैसले की बदौलत मिल्खा धीरे-धीरे ऊंचाइयों की तरफ बढ़ते गए और अंत में भारत को मिला एक महान धावक। उन्होंने तब सुर्खियां बंटोरी जब एक रेस में उन्होंने 394 सैनिकों को हरा दिया। 1958 में मिल्खा सिंह ने कॉमनवेल्थ गेम्स पहला गोल्ड मेडल जीता जो आजाद भारत का पहला स्वर्ण पदक था। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

टोकियो ओलंपिक में की अगुवाई

मिल्खा सिंह ने 1956 में मेलबर्न ओलंपिक, 1960 में रोम ओलंपिक और 1964 में टोक्यो ओलंपिक में भारत की अगुवाई की। 1962 के जकार्ता एशियाई खेलों में मिल्खा सिंह ने 400 मीटर और चार गुना 400 मीटर रिले दौड़ में भी शानदार प्रदर्शन करते हुए स्वर्ण पदक हासिल किया। करियर की शुरूआत में अभ्यास के लिए मिल्खा चलती ट्रेन के लिए पीछे दौड़ लगाते थे और इस दौरान वह कई बार चोटिल भी हुए थे।

भारत सरकार ने किया सम्मानित

मिल्खा तब लोकप्रिय हुए जब उन्होंने 1960 के रोम ओलंपिक खेलों में 45.6 सेकंड का समय निकालकर चौथा स्थान हासिल किया। 1959 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया था। मिल्खा सिंह के परिवार में तीन बेटियां डॉ मोना सिंह, अलीजा ग्रोवर, सोनिया सांवल्का और बेटा जीव मिल्खा सिंह हैं। गोल्फर जीव, जो 14 बार के अंतरराष्ट्रीय विजेता हैं, भी अपने पिता की तरह पद्म श्री पुरस्कार विजेता हैं।

मिल्खा की कहानी सिर्फ पदकों या उपलब्धियों की ही नहीं, बल्कि स्वतंत्र भारत में ट्रैक और फील्ड खेलों का पहला अध्याय लिखने की भी है जो आने वाली कई पीढ़ियों को रोमांचित और प्रेरित करती रहेगी।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here