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‘क्या हैं जंगल के उपकार, मिट्टी, पानी और बयार और मिट्टी, पानी और बयार, जिंदा रहने के आधार…..ये नारे चिपको आंदोलन के हैं…Google ने चिपको आंदोलन के 45 साल पूरे होने पर डूडल बनाकर सलाम किया है…1970 के दशक में राजस्थान में इस आंदोलन का आगाज हुआ…जो अहिंसावादी तरीके से परवान चढ़ा…शांति से पेड़ों को बच्चे की तरह लोगों ने गले लगाकर उन्हें नहीं काटने का आंदोलन चलाया…70 के दशक में पूरे भारत में जंगलों की कटाई के विरोध में एक बड़ा आंदोलन शुरू हुआ जो पूरी दुनिया में चिपको आंदोलन के नाम से प्रसिद्ध है…लोग पेड़ों को बचाने के लिए उनसे चिपक जाते थे और ठेकेदारों को उन्हें नहीं काटने देते थे…उनकी मांग थी कि, भले ही उन्हें गोली मार दी जाए लेकिन वह पर्यावरण को बचाने के लिए पेड़ों को नहीं कटने देंगे…

लेकिन, असल चिपको आंदोलन का इतिहास और पुराना है…इससे पहले 18वीं सदी में राजस्‍थान के बिश्‍नोई समाज के लोगों ने पेड़ों को गले लगाकर पेड़ों की कटाई का विरोध किया था…जब जोधपुर के महाराजा ने जब पेड़ों को काटने का फैसला सुनाया तो बिशनोई समाज की महिलाएं पेड़ से चिपक गई थीं और पेड़ों को काटने नहीं दिया था…केहरी समूह के पेड़ों को बचाने के लिए अमृता देवी के नेतृत्‍व में 84 गांवों के 383 लोगों ने अपनी जान की कुर्बानी दे दी थी…

इस आंदोलन की शुरुआत अप्रैल 1973 में ऊपरी अलकनंदा घाटी के मंडल गांव में हुई थी…तब एकीकृत यूपी में ‘चिपको आंदोलन’ की रियल हीरो पांचवीं पास गौरा देवी थी…चमोली के आदिवासी परिवार में पैदा हुई गौरा देवी ‘चिपको वूमन फ्रॉम इंडिया’ के नाम से मशहूर हैं…गौरा देवी ने गांव की 21 महिलाओं को इकठ्ठा कर जंगल पहुंच गईं थीं…ये आंदोलन धीरे-धीरे पूरे उत्तर प्रदेश और हिमालय में फैल गया था…अल्मोड़ा, नैनीताल और दूसरे स्थानों पर आंदोलनकारियों ने जंगलों की नीलामी को रुकवाया…सुन्दरलाल बहुगुणा इस आंदोलन का बड़ा नाम बन कर उभरे…बाद में इस आंदोलन से कई और लोग जुड़ते चले गए जिसने की चंडी प्रसाद भट्ट ने भी अहम योगदान दिया…सुंदरलाल बहुगुणा ने टिहरी में चिपको आंदोलन की शुरुआत की…साल 1981 से लेकर 1983 तक उन्होंने 5000 किलोमीटर की पैदल यात्रा की और हिमालय के गांवों में लोगों को पर्यावरण के प्रति जागरूक किया…कुमाऊं और गढ़वाल के छोटे-छोटे गांवों में भी इसी तर्ज पर हुए आंदोलन पहाड़ में पर्यावरण को बचाते रहे…एक बार फिर उत्तराखंड में ऑलवेदर रोड़ के नाम पर 41 हजार के करीब पेड़ो को काटा जाना है…जिनमें से लगभग 25 हजार से ज्यादा पेड़ काटे जा चुके हैं…आज गूगल ने उन दिनों की याद दिला दी है जब पूरे विश्व में एक आंदोलन ने उत्तराखंड की महिलाओं की शक्ति और जंगलों को लेकर उनका प्यार सामने रख जंगल के हरे-भरे पेड़ों को कटने से बचाया था…पर्यावरणविद चंडी प्रसाद भट्ट विकास के नाम पर पर्यावरण के विनाश पर रुआंसे हो जाते हैं…

इस आंदोलन के बड़े नाम और गांधीवादी विचारक सुंदरलाल बहुगुणा ने इस आंदोलन को नई दिशा दी और उन्‍होंने तत्‍कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से पेड़ों की कटाई रोकने का आदेश देने की अपील की…साल 2009 में उन्हें ‘पद्म विभूषण’ से सम्मानित किया गया…साल 1987 में चिपको आंदोलन को राइट लावलीहुड पुरस्कार से सम्मानित किया गया…

कुमार मयंक

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