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सेना देश में अपनी सभी छावनियां ख़त्म करने पर विचार कर रही है. खबर है कि सेना ने रक्षा मंत्रालय को प्रस्ताव भी भेज दिया है। रक्षा मंत्रालय को जो प्रस्ताव दिया है उसके मुताबिक सेना की देश में मौज़ूद सभी छावनियों को ख़त्म कर उनमें स्थित सैन्य क्षेत्र को पूरी तरह सेना के हवाले किया जा सकता है।  दरअसल, समय के साथ बढ़ती गई इन सैन्‍य छावनियों के रखरखाव पर बड़ा खर्च आता है और सेना उसे बचाना चाहती है। इसी के मद्देनजर वह छावनियों की बड़ी संख्‍या को कम करना चाहती है।

लगभग ढ़ाई सौ साल पहले ब्रिटिश सेना ने पश्चिम बंगाल के बैरकपुर में अपनी पहली छावनी स्थापित की थी।  धीरे-धीरे मांग के हिसाब से इनकी संख्या बढ़कर 62 हो गई।  सेना के पास इस समय 19 राज्यों में कुल 62 छावनियां हैं, जिसका क्षेत्रफल 17.3 लाख एकड़ है।  अब भारतीय सेना फंड बचाने के लिए इन्हें खत्म करने की तैयारी में है ताकि उनके रख-रखाव पर होने वाले खर्च को बचाया जा सके।  बताया जा रहा है कि इसके लिए बकायदा सेना ने रक्षा मंत्रालय के पास एक प्रस्ताव भेजा है।  प्रस्ताव में अब छावनियों को खास मिलिट्री स्टेशन में तब्दील करने की बात कही गई है।  जिनका पूर्ण नियंत्रण सेना के पास ही रहेगा। . जबकि नागरिक क्षेत्रों को रख-रखाव और दूसरे प्रयोग के लिए स्थानीय नगर निगम को सौंप दिया जाएगा।

अगर इस प्रस्ताव पर मुहर लग गई तो देश के रक्षा बजट के भार को कम करने में मदद मिलेगी।  हर साल छावनी के रख-रखाव, सुरक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने और अतिक्रमण को रोकने में 476 करोड़ रुपये का खर्च आता है।  सेना प्रमुख बिपिन रावत ने इस संबंध में गहन अध्ययन करने के आदेश दे दिए हैं। जिसकी रिपोर्ट सिंतबर की शुरुआत में आ जाएगी। छावनियों को खत्म करने का प्रस्ताव नया नहीं है। इससे पहले साल 2015 में रक्षा सचिव की अध्यक्षता में भारत में छावनियों की प्रासंगिकता पर शोध करने के लिए एक टीम गठित हो चुकी है।  उस समय टीम ने महू, लखनऊ, अल्मोड़ा, अहमदनगर, फिरोजपुर और योल छावनियों को नागरिक क्षेत्र में शामिल करने के लिए छांटा था। हालांकि कुछ विवादों के कारण इस प्रस्ताव को मंजूरी नहीं मिल पाई थी।

—एपीएन ब्यूरो

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