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भारत और रूस एक दूसरे के क़रीबी सहयोगी माने जाते हैं समय-समय पर दोनों देशों ने मजबूती के साथ यह बात साबित भी की है लेकिन जो खबर आ रही है उसके मुताबिक भारत ने रूस के प्रति कड़ा रुख अख्तियार किया है। भारत का रूस के प्रति यह रुख परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) में स्थाई सदस्यता को लेकर लगातार विरोध कर रहे चीन को लेकर सामने आया है। भारत का मानना है कि रूस भारत की सदस्यता के प्रति गंभीर नहीं है। साथ ही भारत,चीन और रूस की बढ़ती नजदीकियों से भी परेशान नजर आ रहा है। ऐसे में भारत को उम्मीद है की कड़े रुख के बाद रूस चीन पर दबाव बनाएगा और भारत की सदस्यता में रोड़ा अटका रहे चीन को मनाने में भारत की सहायता करेगा।

एक अंग्रेजी अख़बार की खबर के मुताबिक भारत ने रूस से स्पष्ट कर दिया है कि अगर उसे सदस्यता नहीं मिलती है तो उन सभी परमाणु ऊर्जा कार्यक्रमों पर रोक लग जाएगी, जिसमें विदेशी भागीदारी शामिल है। भारत का यह रुख इसलिए भी अहम् है क्योंकि दोनों देश मिलकर कुडनकुलम परमाणु परियोजना पर काम कर रहे हैं और अगर भारत अपने रुख पर अड़ जाता है तो रूस के सहयोग वाली यह परियोजना अधर में लटक सकती है।

भारत ने अपना यह रुख रूस के उप प्रधानमंत्री दिमत्री रोगोजिन के सामने स्पष्ट कर दिया है। आपको बता दें कि हाल ही में वह भारत दौरे पर थे। यहाँ उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मुलाकात में कुडनकुलम परमाणु परियोजना में हो रही देरी के मुद्दे को उठाया। हालांकि भारत ने कोई भी ठोस जवाब नहीं दिया। इसके बाद रूस की बेचैनी बढ़नी लाजमी है। रूस यह समझ रहा है कि भारत जानबूझकर इस मामले में देरी कर सकता है। ऐसे में अगले महीने होने वाली रुसी राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मुलाकात में यह चर्चा का विषय हो सकता है।

गौरतलब है कि भारत और चीन के रिश्तों में कड़वाहट जग जाहिर है। इसके पीछे कारण भी कई रहे हैं। चीन-भारत सीमा विवाद,चीन की पाकिस्तान से नजदीकी,दलाई लामा का भारत में रहना और हाल फिलहाल चीन द्वारा परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह(एनएसजी) में भारत की स्थाई सदस्यता का विरोध करना इसकी मुख्य वजहें हैं। ऐसे में रूस के समर्थन से भारत चीन के विरोधी स्वर को दबा कर समूह का पूर्ण सदस्य बन सकता है।इसी रणनीति के तहत भारत ने रूस के सामने चीन को लेकर अपना रुख स्पष्ट कर दिया है।

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