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सुप्रीम कोर्ट में रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर रोजाना सुनवाई हो रही है। इस हफ्ते हुई सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्ष ने अपनी दलील रखी। मुस्लिम पक्षकारों ने अदालत के सामने कहा कि अयोध्या भूमि विवाद का निपटारा कानून के हिसाब से हो, न कि स्कंद पुराण और वेद के जरिए। अयोध्या में लोगों की आस्था हो सकती है, लेकिन इसे सबूत नहीं माना जा सकता।

मुस्लिम पक्ष की तरफ से वरिष्ठ वकील राजीव धवन ने कहा कि संविधान पीठ को दो मुख्य बिन्दुओं पर ही विचार करना है। पहला विवादित स्थल पर मालिकाना हक किसका है और दूसरा क्या गलत परम्परा को जारी रखा जा सकता है। राजीव धवन ने सन 1962 में दिए गए सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर सवाल उठाया और कहा कि जो गलती हुई उसे जारी नहीं रखा जा सकता, यही कानून के तहत होना चाहिए। राजीव धवन ने कहा कि स्वयंभू का मतलब भगवान का प्रकट होना होता है। इसको किसी खास जगह से नहीं जोड़ा जा सकता है। हम स्वयंभू और परिक्रमा के दस्तावेजों पर भरोसा नहीं कर सकते हैं।

मुस्लिम पक्ष की ओर से पेश एक औऱ वरिष्ठ वकील जफरयाब जिलानी ने सुप्रीम कोर्ट में दावा किया कि 1934 से 1949 के बीच विवादित स्थल पर नियमित रूप से नमाज पढ़ी जाती थी। यह भी कहा गया कि ऐसा कोई सुबूत नहीं है, जिससे साबित हो कि उस दौरान वहां नमाज नहीं पढ़ी जाती थी। उन्होंने कहा कि यह अलग बात है कि जुमे को अधिक लोग नमाज पढ़ने आते थे, जबकि बाकी दिन वहां कम लोग पहुंचते थे। जिलानी ने कहा कि 1942 में निर्मोही अखाड़े ने जो सूट दायर किया था, उसमें भी विवादित स्थल को मस्जिद बताया गया है। यह नहीं कहा जा सकता कि वहां मस्जिद नहीं थी। 1885 में भी एक याचिका में कहा गया था कि विवादित जमीन के पश्चिमी हिस्से में मस्जिद थी। अभी इसे भीतरी आंगन कहा जाता है।

अदालत ने कहा कि जब आस्था या विश्वास है कि वहां राम जन्मस्थान है, तो उसे स्वीकार करना होगा। हम इस पर सवाल नहीं कर सकते। सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम पक्षकारों से कहा कि आखिर देवता या जन्मस्थान को क्यों नहीं ‘न्यायिक व्यक्ति’ माना जाना चाहिए?

इस पर राजीव धवन ने कहा कि इसका क्या प्रमाण है कि हिंदू अनंत काल से उस जगह को भगवान राम का जन्म स्थल मान रहे हैं। स्कंद पुराण और कुछ विदेशी यात्रियों के यात्रा वृत्तांत के आधार पर उसे जन्मस्थान नहीं ठहराया जा सकता। इस पर पीठ के सदस्य जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने धवन से पूछा कि आखिर ऐसी क्या चीजें हैं, जिनके आधार पर देवता या जन्मस्थान को न्यायिक व्यक्ति नहीं माना जाना चाहिए।

सर्वोच्च न्यायालय में मामले की अभी तक 23 दिन लगातार सुनवाई हो चुकी है। सुप्रीम कोर्ट मामले के कुल 18 पक्षकारों में से राम लला और निर्मोही अखाड़े की अपीलों को सुन चुका है। अयोध्या मामले की सुनवाई प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली 5 सदस्यीय संवैधानिक पीठ कर रही है। इस पीठ में जस्टिस एस. ए. बोबडे, जस्टिस डी. वाई. चंद्रचूड़, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस एस. ए. नजीर शामिल हैं। सीजेआई रंजन गोगोई करीब जो महीने बाद 17 नवंबर को रिटायर हो रहें हैं। ऐसे में उम्मीद है कि राम मंदिर मामले में फैसला 17 नवंबर के पहले आ सकता है।

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