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देश के ग्रामीण इलाकों को मुख्य मार्गो से जोड़ने की केन्द्र सरकार की महत्वाकांक्षी परियोजना को झांसी जिले का एक गांव में मुंह चिढा रहा है। बुंदेलखंड के झांसी मुख्यालय से यह गांव महज पांच किलोमीटर की दूरी पर स्थित मंडोरा गांव तक पहुंचना अपने आप में एक बड़ी चुनौती है। इस गांव में विकास की हकीकत से रूबरू होने के लिये या तो आपके पास निजी वाहन होना चाहिये वरना आपको चार से पांच किलोमीटर पैदल आना होगा। गांव के निवासी रामरतन ने बताया कि गांव की आबादी पांच हजार के आसपास है लेकिन जब से यह गांव बसा है तब से लेकर आज तक यहां पहुंचने के लिए कोई सार्वजनिक साधन नही है। ग्रामीणों को आज से चार से पांच किलोमीटर पैदल चलकर मुख्य सड़क तक आना पड़ता है और इसके बाद ही जाकर कोई वाहन मयस्सर होता है जिसकी मदद से ग्रामीण आगे का रास्ता तय करते हैं। एक बुर्जुग धनी सिंह ने बताया कि हालात इतने खराब हैं कि रात बिरात अगर किसी की तबीयत बिगड़ जाए तो उस पीड़ित को अस्पताल पहुंचाने में लोगों को जबरदस्त दिक्कतों का सामना करना पड़ता है और कभी कभी तो शहर तक पहुंचने के लिए सवारी की कोई व्यवस्था नहीं हो पाने के कारण पीड़ित व्यक्ति रास्ते में या घर पर ही दम तोड़ देता है।

महिलाओं ने बताया कि गर्मी हो, धूप हो या बारिश अगर घर का सामान या दूसरे जरूरी काम के लिए शहर जाना है तो पैदल ही चार से पांच किलोमीटर का रास्ता तय करना पड़ता है या फिर किसी निजी वाहन वाले की मदद लेनी पडती है लेकिन महिलाओं के खिलाफ आये दिन ही होने वाले अपराधों को देखते हुए दूसरों से वाहन की मदद लेने में अलग तरह के खतरे बने रहते हैं। ऐसे में ज्यादातर महिलाएं यह दूरी पैदल ही तय करती हैं। ऐसा नहीं है कि मंडोरा गांव में पहुंचना ही एक समस्या है इस गांव मे और भी परेशानियां मुंह बाहे खडीं हैं। गांव में बिजली तो है लेकिन ग्रामीणों के अनुसार यहां बिजली कब जाती है यह पूछना बेकार है बल्कि यह पूछना चाहिए कि आती कब है। दिन ढलने के बाद तो अधिकतर समय बच्चों को अपनी पढाई और महिलाओं को अपना काम लालटेन या मोमबत्ती की रोशनी में ही करना पड़ता है। लोगों की आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं कि हर घर में वाहन हो ऐसे में घरों में दैनिक जरूरत का सामान भी लोगों को मुख्य सडक से उतरने के बाद सिर पर ढोकर ही घर तक पहुंचाना पड़ता है। ग्रामीणों के अनुसार ऐसा बिल्कुल नहीं है कि आजादी के इतने साल बीत जाने के बाद भी गांव तक पहुंचने की इस बड़ी समस्या और अन्य परेशानियों को दूर करने के वादे इरादे किसी एक पार्टी के नेताओं या किसी एक दल की सरकार ने किये हों। चुनाव में वोट पाने के लिए लगभग सभी दलों के नुमाइंदे यहां पहुंचते हैं और गांव की इस बडी समस्या के साथ अन्य समस्याओं को सत्ता संभालते ही दूर करने के वादे इरादे भी जताते हैं लेकिन एक बार सत्ता हासिल करने के बाद गांव या यहां की दिक्कतों को तो छोडिये कोई इस गांव की बात भी नहीं करता है।

ग्रामीणों के अनुसार वर्तमान प्रदेश सरकार का न तो कोई मंत्री कभी यहां आया और न ही इस क्षेत्र से विधायक चुने गये समाजवादी पार्टी (सपा) के राजीव सिंह पारीछा ने ही जीत हासिल करने के बाद पलट कर इधर देखा, वोट के लिए सभी ने यहां की खाक छानी। ग्रामीणों का कहना है कि गांव में पानी की भी बड़ी समस्या है। तालाब पोखर आदि तो सूख ही चुके हैं साथ है जबरदस्त गर्मी में हैंडपम्प और कुंओं का पानी भी सूख गया है ऐसे में महिलाओ और बच्चों को दूर दराज से पानी लाना पड़ता है या गाहे बगाहे अगर पानी का टैंकर आ जाएं तो लंबी लंबी कतारों मे खड़ा होना पडता है। केंद्र और प्रदेश सरकार गांव-गांव तक सुविधाओं को पहुंचाने के लिए जो भी योजनाएं बना रही है। उन्हें हकीकत में गांव तक पहुंचाने के लिए अधिकारी भी कोई खास काम करने के लिए तैयार नहीं है। कहा जा सकता है कि इस योजनाओं को अधिकारी पलीता लगा रहे हैं लेकिन सरकार के स्तर पर भी इस स्थिति को बदलने के लिए या अधिकारियों पर कड़ाई दिखाने का कोई काम नहीं किया जा रहा है और इसी का खामियाजा आज भी इस गांव के लोग बदस्तूर उठा रहे हैं।

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