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जहां एक तरफ भारत का पाकिस्तान, चीन जैसे देशों से दिनोंदिन टकराव बढ़ता जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ उसको हथियारों के मामलों में दूसरे देशों पर निर्भर होने की मजबूरियों का भी सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में युद्ध की स्थिति में भारत कहीं हथियारों की कमी से मात न खा जाए इसलिए अब भारत ने इस क्षेत्र में खुद को आत्मनिर्भर बनाने के बारे में सोचा है। देश की सेना को और मजबूत बनाने के लिए और समय पर हथियारों की जरूरतों को पूरा करने के मकसद से अब हथियारों के महत्वपूर्ण उपकरणों और कलपुर्जों का निर्माण देश में ही किया जाएगा। महत्वपूर्ण उपकरणों और कलपुर्जों के आयात में देरी के कारण युद्ध की स्थिति के लिए होने वाली तैयारी को प्रभावित होता देख सेना ने फैसला लिया है कि वह लड़ाकू टैंकों और अन्य सैन्य प्रणालियों के महत्वपूर्ण उपकरणों और कलपुर्जों को तेजी से स्वदेशी तरीके से विकसित करेगी।

सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि वर्तमान में करीब 60 प्रतिशत स्पेयर पार्ट्स विदेशों से आयात किए जाते हैं। इसलिए 41 आयुध फैक्ट्ररियों के संगठन द ऑर्डिनेंस फैक्ट्री बोर्ड ने इस आयात को 60 प्रतिशत से घटाकर 30 फीसदी करने का फैसला किया है। बता दें कि भारत के सैन्य उपकरणों का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता रूस है। यह हमेशा देखा जाता रहा है कि रूस से उपकरणों के आयात में हमेशा देरी हो जाती है।

बता दें कि दो दिन पहले ही खबर आई थी कि कैग की रिपोर्ट के अनुसार  युद्ध छिड़ने की स्थिति में सेना के पास महज 10 दिन के लिए ही पर्याप्त गोला-बारूद है। सेना के वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि आयुध महानिदेशक और बोर्ड सालाना 10 हजार करोड़ रुपये कीमत के कलपुर्जे खरीदते हैं। इसपर तेजी दिखाते हुए सीमावर्ती चौकियों पर तोपखाना और अन्य महत्वपूर्ण सैन्य सामग्री की आपूर्ति के लिए जिम्मेदार  आयुध महानिदेशक ने देश के रक्षा फर्मों से बातचीत शुरू कर दी है।

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