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नदी संरक्षण के लिये संवेदनशील नजरिया प्रदर्शित करने वाली नरेन्द्र मोदी सरकार के तमाम प्रयासों के बावजूद संगम नगरी इलाहाबाद में प्रदूषण की मार से कराह रही करोड़ों लोगों की आस्था की प्रतीक मोक्षदायिनी गंगा नाले की शक्ल तब्दील होती जा रही है।पर्यावरणविदों का मानना है कि जेठ के महीने में गंगा का जलस्तर कम होता है लेकिन इतनी बदतर स्थिति पहले कभी नहीं देखी गयी है। गंगा का जलस्तर लगातार कम हो रहा है। अगर संगम को छोड़ दिया जाए तो शहर के दूसरे घाटों पर आम शहरी पैदल ही गंगा (प्रयाग) पार जा सकते हैं।
मोक्षदायिनी गंगा के जलस्तर में लगातार कमी के चलते जगह-जगह रेत के टीले दिखने लगे हैं। गंगा की धारा सिकुड़ कर पगडंड़ी में तब्दील हो गयी है जिससे श्रद्धालुओं और गंगा किनारे बैठे पंडो में आजीविका को लेकर बेचैनी बढ़ गई है। श्री गंगा पुत्र घटिया संघ के महामंत्री आनंद द्विवेदी ने “यूनीवार्ता” से कहा कि उत्तराखंड में जगह-जगह बने बांधों के कारण अपने अस्तित्व के लिए जूझ रही गंगा की हालत दिनों-दिन खराब होती जा रही है। जगह जगह बांध बनाकर गंगा के पानी को नहरो और अन्यत्र मोड़ दिया जा रहा है जिससे गंगा में लगातार पानी घटता जा रहा है।

पहाड़ी क्षेत्र से जैसे गंगा मैदानी क्षेत्र में बहती है, गंदे नालों, टेनरीज और कल कारखानों से निकलने वाले अवशोषित जल गंगा के पानी में मिलकर उसे प्रदूषित कर रहा है। श्री द्विवेदी (55) ने बताया कि करीब दो दशक बाद आज गंगा के पानी में करीब 8 से 10 फिट कमी आयी है। गत वर्ष की तुलना में यहां दो से तीन फिट पानी किनारों पर कम हुआ है। दिनों-दिन गंगा का जलस्तर घटता जा रहा है। गंगा में इस समय जगह जगह रेत के टीले निकल आए हैं। देवप्रयाग से ऋषिकेष तक गंगा का जल शुद्ध है। ऋषिकेष से हरिद्वार तक स्थिति सामान्य है, लेकिन इसके आगे शुद्धता नगण्य है। महामंत्री ने बताया कि गंगा की अविरलता और निर्मलता के लिए केंद्र से लेकर प्रदेश सरकार चिंतित है। गंगा की अविरलता के लिए नमामि गंगे के तहत काम भी चल रहा है इसके बाद भी गंगा पानी की कमी के कारण किनारा छोड़ने लगी हैं और जगह- जगह रेत की चादर दिख रही है। गंगा को मानवों की स्वार्थ लोलुपता ने इतना मलिन कर दिया है कि उसका जल अब आचमन एवं स्नान के लायक नहीं रह गया। गंगा का प्रदूषण होना एक प्रदूषित राजनीति का ही परिणाम है, जिसमें दावे तो होते हैं, लेकिन काम करने की नीयत साफ नहीं होती। लाखों लोगों की प्यास बुझाने वाली गंगा मानो अपने पुनरुद्धार की प्यास लिए प्रतीक्षारत है।उन्होंने कहा कि इलाहाबाद में 34 गंदे नालों के पानी के कारण गंगा अपनी बदहाली पर आसूं बहा रही है।

श्री द्विवेदी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वाराणसी संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ने के समय कहा था, “न तो मैं आया हूं और न ही मुझे भेजा गया है। दरअसल, मुझे तो मां गंगा ने यहां बुलाया है। यहां आकर मैं वैसी ही अनुभूति कर रहा हूं, जैसे एक बालक अपनी मां की गोद में करता है।” श्री मोदी ने बनारस के लोगों को भरोसा दिलाया था कि वे गंगा को साबरमती से भी बेहतर बनाएंगे। लेकिन चार साल बीतने के बाद भी गंगा अपनी बदहाली के आंसू बहा रही है।लोगों को मोक्ष दिलाने वाली गंगा का पानी प्रदूषण के कारण काला पड़ रहा है। गंगा में प्रदूषण का प्रमुख कारण टैनरीज, रसायन संयंत्र, डिस्टिलरी, बूचड़खानों और अस्पतालों का अपशिष्ट गंगा के प्रदूषण के स्तर को और बढ़ा रहा है।

गंगा के जल में आर्सेनिक, फ्लोराइड एवं क्रोमियम जैसे जहरीले तत्व भी बड़ी मात्रा में मिलने लगे हैं। गंगा में लगातार गिर रहे सीवर के पानी के अलावा कल कारखानों के केमिकल और हैवी मेटल के चलते गंगा में कार्बनिक लोड बढ़ता जा रहा है। इससे गंगा में हानिकारक बैक्टीरिया पैदा हो रहे हैं। उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड क्षेत्रीय इकाई (इलाहाबाद) के सूत्रों के अनुसार गंगा के पानी में तमाम प्रकार की गंदगी मिलती है जिससे यह बिना शोधन के वैसे भी पीने योग्य नहीं होता। टैनरीज, रसायन संयंत्र, डिस्टिलरी, बूचड़खानों और अस्पतालों का अपशिष्ट मिलने दूषित हो चुका है। यह न/न तो नहाने योग्य रह गया है और न ही पीने योग्य। उन्होंने बताया कि गंगा में घुलनशील आक्सीजन (डीओ) 6 मिलीग्राम से अधिक होना चाहिए जबकि वर्तमान समय में 8.6 मिलीग्राम प्रति लीटर है। डीओ का स्तर बेहतर है जबकि बीओडी, पीएच, सीओडी, टोटल कालीफार्म और फोकल कालीफार्म सभी सामान्य स्तर से अधिक है। पीने के पानी में कोलीफार्म का स्तर 50 के नीचे, नहाने के पानी में 500 के नीचे, और कृषि योग्य पानी में इसका स्तर 5000 एमपीएन के नीचे होना चाहिए। जबकि इस समय बढ़कर 27000 हजार तक पहुंच गया है। फीकल कॉलीफार्म भी 100 से कम होना चाहिए, इसका आंकड़ा 13000 हजार तक पहुंच गया है। इनके बढ़ने के चलते पानी में हानीकारक बैक्टीरिया की मात्रा गंगा में बढ़ गई है।

गंगा में घुलित आक्सीजन (डीओ) छह मिलीग्राम प्रति लीटर या उससे अधिक होनी चाहिए जबकि वर्तमान में 8.6 मिलीग्राम प्रति लीटर है और जैविक आक्सीजन डिमांड (बीओडी) 02 मिलीग्राम प्रति लीटर या उससे भी कम होनी चाहिए लेकिन वर्तमान में इसका स्तर 3.6 है जाके इसकी शुद्धता के लिए ठीक नहीं है।उन्होंने बताया कि बैक्टीरियो फॉज नाम का बैक्टीरिया गंगा में पाया जाता है। यह केवल गंगा नदी में पाया जाता है। इसका उन सभी बैक्टीरिया को खाना जो पानी को सड़ाते हैं। यही कारण है कि गंगा का पानी कभी नहीं सड़ता लेकिन प्रदूषण इतना बढ गया है कि ये बैक्टीरिया के लिए भी खतरा उत्पन्न हो गया है।

सूत्रों ने बताया कि गंगा नदी को ‘राष्ट्रीय धरोहर’ भी घोषित कर दिया गया है और ‘गंगा एक्शन प्लान एवं राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना’ लागू की गई है। सरकार द्वारा इन योजनाओं पर अरबों रुपए खर्च किये जा चुके हैं। इसके अलावा ‘राष्ट्रीय नदी गंगा बेसिन प्राधिकरण’ (एनआरजीबीए) पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 की धारा-3 के अन्तर्गत 20 फरवरी, 2009 को केन्द्र सरकार द्वारा स्थापित किया गया। योजनाएँ तो अच्छी हैं परन्तु जब तक इन योजनाओं का वास्तविक रूप से सही मायनों में क्रियान्वयन नहीं किया जाता तब तक इनका कोई प्रभाव दिखाई देना मुश्किल है। दारागंज निवासी 45 वर्षीय नाविक शिवराम निषाद ने बताया कि वह 1990 से गंगा और यमुना में नाव चलाकर पर्यटकों को सैर कराता है। उसकी आजीविका का साधन भी यही है। वर्तमान में गंगा की दुर्दशा है वह पिछले करीब 20 सालों में देखने को नहीं मिली। गंगा में श्रद्धालु नहाने के बजाय यमुना को प्राथमिकता दे रहे हैं। इस समय गंगा जितनी सूखी हैं इससे पहले यह दुर्दशा कभी नहीं देखा। एक अन्य नाविक दिनेश निषाद (28) ने बताया कि अब गंगा में नाव चलना मुश्किल हो रहा है।

संगम से यमुना की ओर तो नाव जा सकती है लेकिन दूसरे घाटों पर जाते-जाते नाव के जमीन से टकराने का खतरा बना रहता है। एक समय था जब गर्मी के दिनों में लोग शाम के वक्त गंगा किनारे वोटिंग करने आते थे। लेकिन अब गंगा का जलस्तर घटने से नावों का चलना बन्द हो गया जिससे आमदनी भी समाप्त हो गयी है। इस कारण तमाम नाविकों ने अपनी नावों को या तो खडा कर दिया है या फिर संगम में पर्यटकों को घुमा रहे हैं। नाविकों का कहना है कि पर्यटक और श्रद्धालु ही हमारे आये के स्रोत हैं। नाव बन्द होने से आय का स्रोत खत्म हो गया है। नाव गंगा में न/न चलकर यमुना और संगम में चल रही है।

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