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पाकिस्तान मुस्लिम लीग के नेता और पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की पत्नी कुलसुम शरीफ ने नेशनल असेंबली के उपचुनाव चुनाव जीत लिया है। बता दें पनामा पेपर्स के आरोप में दोषी पाये जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने नवाज शरीफ को प्रधानमंत्री पद के लिए अयोग्य ठहरा दिया था। जिसके चलते नवाज शरीफ को प्रधानमंत्री पद व संसद सदस्यता से  इस्तीफा देना पड़ा। जिससे उनकी संसदीय सीट खाली हो गई थी।

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पाकिस्‍तान मुस्लिम लीग- नवाज (PML-N) की उम्‍मीदवार कुलसुम शरीफ को 59,414 वोट मिले। इसके अलावा दूसरे नंबर पर इमरान खान की पार्टी तहरीक-ए-इंसाफ के डॉ यास्‍मीन रशीद रहीं, जिन्‍हें 13,268 वोट मिले। अन्य पार्टियों के लोकप्रिय उम्‍मीदवारों में से पाकिस्‍तान पीपुल्‍स पार्टी के फैजल मीर, जमात इस्‍लामी के जिया उद-दीन अंसारी और मिल्‍ली मुस्लिम लीग समर्थ‍ित याकूब शेख थे। लाहौर से नेशनल असेंबली की इस सीट के लिए कुल 44 उम्मीदवार मैदान में थे।

इस उपचुनाव में जितनी चर्चा कुलसुम की जीत पर नहीं हो रही है बल्कि उससे कहीं ज्यादा चर्चा जमात-उद-दावा के मुखिया हाफिज सईद की हो रही है। ऐसा इसलिए क्‍योंकि उसका समर्थक निर्दलीय उम्‍मीदवार मोहम्‍मद याकूब पांच हजार वोटों के साथ तीसरे स्‍थान पर रहा। यह इसलिए ज्‍यादा अहम है क्‍योंकि मुख्‍य विपक्षी दल आसिफ अली जरदारी की पाकिस्‍तान पीपुल्‍स पार्टी को महज ढाई हजार वोट मिले।

बता दें करीब डेढ़ महीने पहले जमात-उद-दावा के सियासी संगठन के रूप में मिल्ली मुस्लिम लीग का आगाज हुआ है। जिससे यह दल अभी चुनाव आयोग में नामांकित नहीं किया गया है। लिहाजा इसके प्रत्याशी मोहम्मद याकूब ने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा। चुनाव के दौरान याकूब की रैलियों में सईद अहमद के पोस्टर भी दिखे थे। जिसे लेकर चुनाव आयोग के सख्त रूख कहा कि जिन लोगों के नाम आतंकी गतिविधियों से जुड़े हैं उनका इस्तेमाल चुनाव प्रचार में नहीं कर सकते हैं। लिहाजा उनको प्रचार के दौरान पोस्टरों को हटाना पड़ा।

सईद अहमद आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा का संस्थापक और वर्तमान में जमात-उद-दावा से सम्बंधित है। यह भारत के मोस्ट वांटेड अपराधियों की सूची में शामिल है। मुंबई के 26/11 हमले में उसका हाथ होने की बात सामने आयी थी।

लाहौर के इस निर्वाचन क्षेत्र से नवाज शरीफ तीन बार चुने गए हैं। 1999 में जनरल परवेज मुशर्रफ द्वारा सैन्य तख्तापलट के बाद नवाज के जेल में रहने के दौरान कुलसुम ने ही पार्टी का नेतृत्व किया था हालांकि उन्होंने कभी चुनाव नहीं लड़ा।

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