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वक्त और मौका देखकर उल्लू सीधा करना चीन की पुरानी आदत है। कुछ ऐसा ही ड्रैगन ने कश्मीर के मुद्दे पर किया है। जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने के भारत सरकार के फैसले के खिलाफ चीन ने पाकिस्तान का साथ दिया। यूएन जैसे मंच पर उसने पाकिस्तान के लिए कश्मीर का मुद्दा उठाया, भारत को एकतरफा कार्रवाई से बचने की नसीहत भी दी। लेकिन, अब जब अक्टूबर में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग अनौपचारिक बैठक के लिए भारत आने वाले हैं, तो ड्रैगन का रुख भी कश्मीर को लेकर बदल गया है।

चीनी विदेश मंत्रालय ने साफ किया है कि मोदी-जिनपिंग बैठक में कश्मीर मुद्दा नहीं होगा। चीन के मुताबिक, कश्मीर मामला इतना बड़ा नहीं है, कि दोनों नेताओं की मुलाकात में बातचीत का हिस्सा बने। अगर ऐसा है, तो कश्मीर को लेकर चीन के पहले के रवैए को क्या कहा जाए। क्या चीन ने महज दोस्त होने के नाते पाकिस्तान को खुश करने के लिए कश्मीर पर उसकी तरफ से बयान दिया। क्या चीन नहीं चाहता कि भारत के साथ उसके बढ़ते व्यापारिक संबंधों में कश्मीर दीवार बनकर खड़ा हो। या फिर ड्रैगन भारत और पाकिस्तान दोनों से खेलने की कोशिश कर रहा है। चीन के साथ भारत का अतीत इतना अच्छा नहीं रहा है। भारत को कदम-कदम पर चीन से धोखा मिला है, ऐसे में आसानी से भरोसा करना नामुमकिन है।

मामला चाहे मसूद अजहर को वैश्विक आतंकी घोषित करने का रहा हो, या फिर हाफिज सईद को बचाने का, चीन हमेशा खुलकर पाकिस्तान के साथ खड़ा रहा है। भारत को नुकसान पहुंचाने वाले पाकिस्तान के हर कदम का ड्रैगन ने बचाव किया है। ऐसे में भारत को भी सचेत रहने की जरुरत है। भारत दो ऐसे पड़ोसी मुल्कों से घिरा है, जो उसके लिए लगातार मुश्किलें पैदा करते रहे हैं। अंतर बस इतना है कि चीन के साथ तमाम विवादों के बाद भी व्यापारिक संबंध लगातार बढ़ रहे हैं, जबकि, पाकिस्तान के साथ रिश्ते निम्न स्तर पर हैं। दरअसल, चीन की नीति विस्तारवादी है और वो गाहे-बगाहे LAC पर भारत की परीक्षा लेता रहता है। डोकलाम विवाद इसका उदाहरण है। चीन नहीं चाहता कि उसके आसपास कोई ताकतवर मुल्क हो जो उसे चुनौती देने की क्षमता रखता हो। यही कारण है कि वो भारत को कंट्रोल करने के लिए पाकिस्तान की मदद लेता है। जवाब में भारत ने भी अपनी नीति में बदलाव किया है। भारत ने चीन की साजिश के खिलाफ अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ गठबंधन तैयार किया है। इन देशों की मदद से भारत ने भी चीन पर लगाम लगाने की रणनीति अपनाई है। ये वो देश हैं, जो कहीं ना कहीं चीन के विस्तारवादी रवैए से परेशान हैं। साउथ चाइना सी में चीन की दादागीरी का वहां मौजूद छोटे देश विरोध तो करते हैं, लेकिन, ताकतवर ड्रैगन के आगे उनका विरोध सीमित रह जाता है।

ऐसे में भारत ने अमेरिका की मदद से हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपनी गतिविधियां बढ़ाई हैं, ताकि, चीन को रोका जा सके। कुल मिलाकर देखा जाए, तो चीन भारत को रोकने के लिए प्रेशर पॉलीटिक्स का इस्तेमाल कर रहा है। इसमें राजनीति, रणनीति, आर्थिक और सामरिक नीति का समावेश है, तो जवाब में भारत ने भी शक्ति संतुलन को साधने के लिए उन देशों की मदद से योजना तैयार की है, जो या तो चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकना चाहते हैं, या फिर उसके डर से खुलकर सामने नहीं आना चाहते, लेकिन चीन के प्रभुत्व को खत्म करना चाहते हैं। हाल के दिनों में अंतरराष्ट्रीय पटल पर जितने बदलाव देखे गए हैं, उसने विश्व मंच पर भारत की बढ़ती ताकत और स्वीकार्यता को दर्शाया है। चीन को ये महसूस होने लगा है कि वो दिन लद गए जब अकेले अपने दम पर वो भारत को रोक सकता था। आज दुनिया भारत की आवाज सुन रही है, और चीन को भी चाहे ना चाहे उसे स्वीकार करना पड़ रहा है।

आनन्द पाल सिंह

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