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New Delhi: घटोत्कच महाभारत का वह योद्धा था जिसने अपनी जान देकर अर्जुन की जान बचाई थी। घटोत्कच अर्जुन के मझले भैया भीम और हिडिम्बा का पुत्र था। पैदा होते समय उसके सिर पर केश (उत्कच) न होने के कारण उसका नाम घटोत्कच रखा गया। वह अत्यन्त मायावी निकला और जन्म लेते ही बड़ा हो गया। उसका देह पर्वत के समान था।

अर्जुन , महाराज इंद्र के पुत्र थे। कर्ण ने प्रतिज्ञा कर ली थी कि वह युद्ध में अर्जुन को मार देगा। कर्ण की इस प्रतिज्ञा से देवराज इंद्र पुत्रमोह में व्याकुल हो उठे। इंद्र ने महादानी कर्ण की सबसे शक्तिशाली शक्ति कवच और कुंडल को दान में मांग लिया। लेकिन अंत में कर्ण की दानवीरता से इंद्र इतने प्रभावित हो गए कि उन्होंने एक ऐसी अमोषशक्ति कर्ण को वरदान में दे दिया जिससे कि वह उस शक्ति का उपयोग किसी भी व्यक्ति को मारने के लिए कर सकता था।
कर्ण इंद्र द्वारा दिए गए शक्ति को अर्जुन के लिए बचा कर रखा था। लेकिन श्रीकृष्ण ने बड़ी ही चतुराई से उसका इस्तेमाल घटोत्कच पर करवा दिया।

14वें दिन, सूर्य डूबने के बाद भी युद्ध जारी रखने के लिए मशाल जलाई गई। रात का समय था। घटोत्कच माया-युद्ध शुरु कर दिया। कर्ण के सामने था घटोत्कच। कर्ण का सामान्य बाण घटोत्कच पर कोई असर नहीं कर रहा था। घटोत्कच कौरव सेना को चीटियों के तरह मशल रहा था। जिसे देख दुर्योधन दुखी हो उठा। उसे लग गया कि घटोत्कच कुछ देर और रह गया तो पूरी की पूरी सेना को मार देगा। वह अपने पाँव तले दबाकर ही सैकड़ों सैनिकों को मार देता था।

दुर्योधन ने कर्ण से विनती किया कि वह इंद्र द्वारा दी गई शक्ति का प्रयोग करे। कर्ण यह नहीं चाहता था , क्योंकि वो जानता था कि इसके आलवा उसके पास दूसरी कोई शक्ति नहीं है जिससे वो अर्जुन को मार सके। लेकिन दुर्योधन के बार-बार कहने पर वो इंद्र द्वारा दी गई शक्ति को घटोत्कच पर छोड़ दिया। घटोत्कच की मृत्यु हो गई। घटोत्कच ने गिरते-गिरते अपने पर्वत जैसे देह से विरोधी सेना के हजारों सैनिकों को मार दिया।

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