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New Delhi: पिता की ख़ुशी के लिए गंगा पुत्र देवव्रत की वो प्रतिज्ञा जिसने पूरे ब्रह्माण्ड को हिला दिया। देवव्रत ने न इससे पहले ऐसी कोई प्रतिज्ञा ली और न ही इसके बाद। इसी प्रतिज्ञा के बाद देवव्रत ‘भीष्म’ कहलाये।

देवव्रत की प्रतिज्ञा ”मैं गंगा पुत्र देवव्रत , चारों दिशाओं धरती और आकाश को साक्षी मानकर आज यह प्रतिज्ञा करता हूँ कि मैं आजीवन ब्रह्मचारी रहूँगा ,आजीवन विवाह नहीं करूँगा, वंशहीन जिऊंगा और वंशहीन ही मरूँगा। यह मेरी अखंड प्रतिज्ञा है”।  इस प्रतिज्ञा के पीछे अपने ही पिता की ख़ुशी थी।

देवव्रत हस्तिनापुर के राजा शांतनु तथा देवनदी गंगा के पुत्र थे। राजा शांतनु एक सत्यवती नामक सुंदरी पर मोहित हो गए। महाराज शांतनु ने सत्यवती से शादी के लिए उनके पिता निषादराज के पास प्रस्ताव रखा। निषादराज अपनी पुत्री का हाथ शांतनु के हाथ में देने के लिए सिर्फ एक ही शर्त पर राजी हुए कि सत्यवती का संतान ही हस्तिनापुर का अधिकारी होगा। शांतनु सोच में पड़ गए , क्योंकि वह पहले ही देवव्रत को युवराज घोषित कर चुके थे। अंततः शांतनु ने निषादराज की यह  शर्त ठुकरा दी।

शांतनु , सत्यवती के प्रेम में इतनी गहराई तक डूब चुके थे कि वो उनको सोचते-सोचते उदास रहने लगे। पिता को यूँ उदास देख देवव्रत को भी कुछ ठीक नहीं लगता। वे बार-बार पिता के उदासी को जानने की कोशिस करते लेकिन शांतनु इस बात का जिक्र देवव्रत से नहीं करते।

देवव्रत को पिता के उदासी का कारण एक दिन उनके सारथि से चला। उसके बाद देवव्रत खुद निषादराज के पास अपने पिता के लिए सत्यवती का हाथ मांगने गए। निषादराज ने अपनी वही पुरानी शर्त देवव्रत के सामने रख दी। तब देवव्रत ने प्रतिज्ञा ली कि इस कन्या से उत्पन्न पुत्र ही राज्य का अधिकारी होगा। निषादराज ने कहा कि, ‘यदि तुम्हारे पुत्र ने उसे मारकर राज्य छिन लिया तब क्या होगा?

उसके बाद देवव्रत ने प्रतिज्ञा ली और यहीं से वह भीष्म कहलाये। जब पिता शांतनु को यह पता चला कि उनकी ख़ुशी के वजह देवव्रत ने आजीवन बालब्रह्मचारी रहने का शपथ लिया है तो उन्होंने अपने पुत्र देवव्रत को इच्छामृत्यु का वरदान दिया।

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