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पटना उच्च न्यायालय ने 30 साल पहले नियुक्त अपने कर्मचारी को केंद्रीय सरकार द्वारा बर्खास्तगी के आदेश को बरकरार रखा

पटना के उच्च न्यायालय ने फर्जी अनुसूचित जाति प्रमाणपत्र के उपयोग करने पर 30 साल पहले एक अपर डिवीजन क्लर्क के पद पर धोखाधड़ी करने वाले  एक कर्मचारी को बर्खास्त करने के केंद्र सरकार के फैसले को बरकरार रखा।

न्यायमूर्ति शिवाजी पांडे और न्यायमूर्ति अंजनी कुमार शरण की खंडपीठ केंद्र सरकार की एक समीक्षा याचिका पर सुनवाई की , जहां उच्च न्यायालय ने 5 साल पहले पटना में केंद्रीय उत्पाद शुल्क विभाग में अपर डिवीजन क्लर्क के पद पर मनोज कुमार को बहाल किया गया था।

उच्च न्यायालय के बहाली के आदेश के बाद, केंद्र सरकार ने उच्चतम न्यायालय के समक्ष एक अपील दायर की, जिसने इसे देरी के आधार पर खारिज कर दिया।

इसके बाद 2018 में उच्च न्यायालय के समक्ष एक समीक्षा याचिका दायर की गई थी।

कुमार ने खुद को एसएससी परीक्षा में अनुसूचित जाति समुदाय से संबंधित दिखाया था। हालांकि जब उन्हें अपने ज्वाइनिंग फॉर्म को अटेस्ट करने के लिए कहा गया, तो कुमार ने कहा कि वह शेड्यूल कास्ट कैटेगरी से  नहीं है ।

इसके बाद, एसएससी ने अपनी नियुक्ति वापस ले ली और उनको 17 फरवरी, 1993 को सेवा से हटा दिया गया।

सेंट्रल एडमिसिनेटिव ट्रिब्यूनल के समक्ष एक आवेदन को दो बार खारिज किया, ट्रिब्यूनल ने पहली बार 1993 में तकनीकी आधार पर और  दूसरी बार 2005 में जब कैट ने कुमार के खिलाफ जांच को सही ठहराया।

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