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चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया से सभी न्यायिक और अर्ध न्यायिक मंचों पर सभी तरह के कामों के लिए A4 काग़ज़ के उपयोग की अनुमति देने का आग्रह किया है। ये आग्रह कानून के छात्रों ने किया है।

भारतीय क़ानूनी पेपर 14 इंच लंबा 8.5 इंच चौड़ा होता है जबकि A4 काग़ज़ 11.7 इंच लंबा और 8.3 इंच चौड़ा होता है। लीगल पेपर मोटा और उसका घनत्व ज़्यादा होता है और इससे ज़्यादा समय तक टिकने की उम्मीद की जाती है।

इन छात्रों ने अपने पत्र में कहा है कि “इस समय, भारत में अधिकांश न्यायिक और अर्ध-न्यायिक कार्यों में विशेष रूप से डिज़ाइन किए हुए पेपर का प्रयोग होता है जिसे लीगल पेपर कहा जाता है। हालाँकि, कुछ हाइकोर्टों में ज़िला अदालत और अर्ध-न्यायिक निकायों में इन दोनों ही तरह के पेपर का प्रयोग होता है। अलग-अलग जगह पर अलग-अलग तरह के पेपर के प्रयोग की यह असंगठित और तर्कहीन परिपाटी से न केवल लोगों को अदालत में और अदालत के बाहर न्याय पाने में मुश्किलें पेश आ रही हैं बल्कि यह पूरी विधि व्यवस्था को असामान और मनमाना बना रहा है।”

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इन छात्रों ने आरटीआई से प्राप्त जानकारियों के आधार पर कहा है, “यह कहा गया है कि एक तरह की व्यवस्था बनाने के लिए आदेशों/फ़ैसलों/दलीलों को तैयार करने में पीडीएफ फ़ॉर्मैट, यूनिकोड और A4 काग़ज़ का प्रयोग किया जाना चाहिए”।

इन छात्रों ने यह भी बताया कि कैसे सुप्रीम कोर्ट के परिसर में ही फ़ोटो कॉपी करने वाले लीगल पेपर की फ़ोटो कॉपी करने के लिए प्रति कॉपी ₹2 लेते हैं जबकि A4 पेपर की फ़ोटो कॉपी के लिए ₹1 लेते हैं। “दोनों पेपर में अंतर की वजह से वित्तीय बोझ दोगुना हो जाता है।

सरकार को अगर कुल मिलाकर लीगल पेपर की फ़ोटो कॉपी करने पर ₹1 करोड़ ख़र्च करना पड़ता है तो हर जगह अगर A4 आकार ही प्रयोग हो तो यह ख़र्च ₹50 लाख ही होगा”, इन लोगों ने कहा।

फिर, इन तीनों छात्रों ने सुप्रीम कोर्ट नियम, 2013 के आदेश नम्बर 15  के नियम 1 का ज़िक्र किया जिसमें A4 पेपर के प्रयोग की बात कही गई है।

इन अपीलकर्ताओं का कहना था कि जहाँ तक कि उन्हें पता है, लीगल आकार के पेपर का चलन अंग्रेज़ों के काल में शुरू हुआ जो अभी तक चल रहा है। छात्रों ने सीजेआई से अपील की है कि वह संबंधित प्राधिकरण को यह निर्देश दें कि वे हर जगह और हर कार्य के लिए A4 पेपर का प्रयोग करें और सभी हाइकोर्टों और अर्ध-न्यायिक निकायों को इसे मानने को कहें।

-संजय रमन सिन्हा

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