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सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश अरुण मिश्रा ने भूमि अधिग्रहण कानून से संबंधित मामले पर संविधान पीठ की सुनवाई से खुद को अलग करने से इनकार किया। भूमि अधि‍ग्रहण में उचि‍त मुआवजा और पारदर्शि‍ता का अधि‍कार, सुधार और पुनर्वास अधिनि‍यम, 2013 की धारा 24(2) की व्याख्या संबंधित मामलों की सुनवाई के लिए संविधान पीठ की अगुवाई कर रहे जस्टिस अरुण मिश्रा सुनवाई करते रहेंगे। पांच जजों के संविधान पीठ में फैसला सुनाते हुए जस्टिस मिश्रा ने कहा कि वो सुनवाई से अलग नहीं होंगे। मामले से जुड़े कुछ याचिकाकर्ताओं ने जस्टिस मिश्रा से सुनवाई में शामिल ना होने की मांग की थी।

याचिकाकर्ताओं ने कहा था कि एक विशेष दृष्टिकोण रखने के लिए एक न्यायाधीश के पक्षपात ने पूर्वाग्रह की उचित आशंका को जन्म दिया, जो पुनरावृत्ति के लिए पर्याप्त है।

जस्टिस अरुण मिश्रा ने मामले की संविधान पीठ से उन्हें हटाने के लिए सोशल मीडिया और खबरों में चलाए जा रहे अभियान पर नाराजगी जाहिर की थी। उन्होंने कहा था कि यह किसी जज विशेष के खिलाफ नहीं बल्कि संस्थान की छवि खराब करने की कोशिश है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अगर पांच सदस्यीय संविधान पीठ से न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा को अलग करने की मांग करने के पक्षकारों के अनुरोध को स्वीकार कर लिया गया तो यह इतिहास का सबसे काला अध्याय होगा, क्योंकि न्यायपालिका को नियंत्रित करने के लिये उसपर हमला किया जा रहा है।

जस्टिस मिश्र वह फैसला सुनाने वाली पीठ के सदस्य थे जिसने कहा था कि सरकारी एजेंसियों द्वारा किया गया भूमि अधिग्रहण भू स्वामी द्वारा मुआवजे की राशि स्वीकार करने में पांच साल तक का विलंब होने के आधार पर रद्द नहीं किया जा सकता।

-संजय रमन सिन्हा

 

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