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पटना हाईकोर्ट ने एक बार फिर कहा कि घायल व्यक्ति की गवाही व्यापक महत्व की होती है और जब तक उसके बयान में व्यापक विरोधाभास न हो तब तक उस पर भरोसा अवश्य किया जाना चाहिए। इस प्रकार, हाईकोर्ट ने निचली अदालत की ओर से अभियुक्त की दोषसिद्धि के उस आदेश में हस्तक्षेप करने से इन्कार कर दिया। जिसके तहत ट्रायल कोर्ट ने अपीलकर्ता चंदन चौधरी को भारतीय दंड संहिता  की धारा 307, 326, 341 और 447 के तहत सात साल जेल की सजा सुनायी थी।

इस मामले में अभियुक्त के खिलाफ घातक हथियारों से गंभीर रूप से घायल करके हत्या का प्रयास करने, गलत तरीके से अपने कब्जे में रखने तथा आपराधिक तरीके से अनाधिकार प्रवेश करने के आरोप थे।

सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी थी कि “परीक्षण पहचान परेड आयोजित करने में जांच एजेंसी की विफलता से अदालत में पहचान के सबूत पर कोई असर नहीं पड़ता। इस तरह की पहचान का कितना महत्व होना चाहिए, इसका निर्धारण अदालत प्रत्येक मामले में अलग-अलग तथ्यों और परिस्थितियों के अनुरूप करेगी। उचित मामलों में अदालत पहचान के साक्ष्य को भी पुष्टि के बिना स्वीकार कर सकती है।

 

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