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सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद लगी पाबंदियों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई की। ये याचिकाएं कश्‍मीर टाइम्‍स के एडिटर अनुराधा भसीन और कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद की ओर से दायर की गई हैं। इन याचिकाओं में राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने की वैधता के साथ विभिन्न प्रतिबंधों को चुनौती दी गई है।

सुनवाई के लिए अदालत में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता उपस्थित नहीं थे। जिसको लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी आपत्ति ज़ाहिर की है। उन्होंने कहा कि वो कोर्ट में मौजूद क्यों नहीं है? जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि सॉलिसिटर जनरल कोर्ट नंबर 3 में किसी अन्य मामले में दलील दी रहे हैं।

याचिकाकर्ताओं की तरफ से वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे ने दलीलें दीं। उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं होना चाहिए कि याचिकाकर्ताओं और उनके पक्ष के लोगों को राष्ट्र की अखंडता के खिलाफ देखा जाए। प्रतिबंध लागू हुए 106 दिन हो गए हैं।

जस्टिस रमना ने पूछा, क्या आप देरी के लिए सुप्रीम कोर्ट की आलोचना कर रहे हैं?

दवे ने कहा कि हर्गिज नहीं। मैं प्रतिबंधों को नहीं उठाने के लिए सरकार की आलोचना कर रहा हूं। दवे ने कहा कि 7 मिलियन लोगों के अधिकार किसी के लिए भी महत्वपूर्ण हैं।

दवे ने दलील दी कि सरकार इस आधार पर प्रतिबंधों को सही नहीं ठहरा सकती है क्योंकि कश्मीर वर्षों से आतंकवाद की चपेट में है।

दवे ने हांगकांग की मिसाल दी और कहा कि हफ्तों से विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं लेकिन तब भी एक कम्युनिस्ट राज्य ने हमारे जैसे प्रतिबंध नहीं लगाए।

इंटरनेट पर प्रतिबंध के खिलाफ आवाज उठाते हुए दवे ने केरल उच्च न्यायालय के फैसले का हवाला दिया जिसमें यह कहा गया था कि इंटरनेट तक पहुंच एक मौलिक अधिकार है। दवे ने कहा कि सरकार महज केंद्र से वक्त चाहती है, सरकार कानून का पालन नहीं कर रही है।

पिछली सुनवाई में शीर्ष अदालत ने जम्‍मू-कश्‍मीर से अनुच्‍छेद-370 हटाए जाने के बाद लगी पाबंदियों के खिलाफ दाखिल याचिकाओं पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया था। सर्वोच्‍च अदालत ने जम्‍मू-कश्‍मीर में अस्‍पतालों में इंटरनेट सेवाओं की बहाली की मांग को लेकर दाखिल याचिकाओं पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा था। याचिकाओं में मांग की गई है कि अदालत सरकार को निर्देश दे कि राज्‍य के सभी अस्‍पतालों और चिकित्‍सा संस्‍थानों में इंटरनेट और लैंडलाइन टेलीफोन सेवाओं की त्वरित बहाली हो सके।

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