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सुप्रीम कोर्ट ने ट्रैफिक नियमों के तोड़ने वाले दोषियों पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि दोषी अपना अपराध स्वीकारते हुए जुर्माना देकर बच निकलेगा, इस लिए सड़क यातायात के अपराध को आईपीसी और मोटर वाहन अधिनियम दोनों के तहत अभियोजित किया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सड़क यातायात के अपराधों पर मोटर वाहन अधिनियम और भारतीय दंड संहिता दोनों के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है।

पीठ ने कहा कि “अगर आईपीसी एम.वी अधिनियम के लिए रास्ता दे देता है, और सीआरपीसी के प्रावधान एम.वी अधिनियम के प्रावधानों के तहत दब जाते हैं या अधीन हो जाते हैं। जैसा कि हाईकोर्ट ने माना है तो ऐसी स्थिति में तेज और लापरवाही से वाहन चलाते समय हुई मौत,गैर इरादतन हत्या, गैर इरादतन हत्या, या गंभीर चोट, या सरल चोट आदि के मामले कंपाउंडेबल हो जाऐंगे. इस तरह की व्याख्या के परिणाम यह होंगे कि दोषी अपना अपराध स्वीकारते हुए जुर्माना देकर बच निकलेगा और उसे अपने अपराध के लिए किसी भी अभियोजन या मुकदमें का सामना नहीं करना पड़ेगा।”

न्यायमूर्ति इंदु मल्होत्रा और न्यायमूर्ति खन्ना की पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए गुवाहाटी हाईकोर्ट द्वारा असम, नागालैंड, मेघालय, मणिपुर, त्रिपुरा, मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश राज्य को जारी निर्देशों को रद्द कर दिया है। इन निर्देशों में हाईकोर्ट ने कहा था कि सड़क यातायात अपराधों के मामले में कार्रवाई केवल मोटर वाहन अधिनियम के प्रावधानों के तहत की जाए, न कि भारतीय दंड संहिता के प्रावधानों के तहत।

हाईकोर्ट के अनुसार, एम.वी. अधिनियम का स्टेटस आईसीपी के समान है  और यह नहीं माना जा सकता है कि मोटर व्हीकल एक्ट (एम.वी) अधिनियम या तो अधीनस्थ कानून है, या स्टेटस के मामले में आईपीसी और सीआरपीसी से किसी तरह कमतर है।

खंडपीठ ने कहा कि हाईकोर्ट द्वारा की गई व्याख्या के परिणाम यह होंगे कि दोषी अपना अपराध स्वीकारते हुए जुर्माना देकर बच निकलेगा और उसे अपने अपराध के लिए किसी भी अभियोजन या मुकदमें का सामना नहीं करना पड़ेगा। आईपीसी और एमवी अधिनियम के प्रावधानों के बीच कोई मतभेद या विरोधाभास या टकराव नहीं है। पीठ ने दोनों अधिनियमों के प्रावधानों का जिक्र करते हुए कहा कि वे पूरी तरह से अलग-अलग क्षेत्रों में काम करते हैं। दोनों विधियों के तहत प्रदान किए गए दंडात्मक परिणाम भी एक दूसरे से स्वतंत्र और अलग हैं।

संजय रमन सिन्हा

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