उत्तराखंड कि सरकार नें अपने राज्य में कावंड़ यात्रा करने पर रोक लगा दिया है। पिछले साल की तरह इस बार भी उत्तराखंड में कांवड़ यात्रा नहीं होगी। वहीं उत्तर प्रदेश की सरकार ने कावड़ यात्रा के लिए कुछ शर्तों के साथ इसे जारी रखने की मंजूरी दी थी लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस पर स्वतः संज्ञान लेते हुए राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है। कुछ सवाल पूछे हैं। शुक्रवार को फिर सुनवाई होगी, क्या आप कावड़ यात्रा के बारे मे जानते है, ये क्यों होती है।

हम आपको बता दें कि कांवड़ यात्रा श्रावण मास यानि सावन के महीने में होती है, जो ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार जुलाई का महीना होता है, जबकि यह महीना पूरा बारिश का होता है। कावड़ की शुरुआत श्रावण मास की शुरुआत से ही हो जाती है और ये 13 दिनों तक यानि श्रावण की त्रयोदशी तक चलती है। इसका संबंध गंगा के पवित्र जल और भगवान शिव से है. इस बार यह यात्रा 22 जुलाई से शुरू होना था।

सावन के महीने में कांवड़ यात्रा के लिए श्रृद्धालु उत्तराखंड के हरिद्वार, गोमुख और गंगोत्री जाते है। वहां से पवित्र गंगाजल लेकर अपने निवास स्थानों के पास प्रसिद्ध शिव मंदिरों में उस जल से चतुर्दशी के दिन उनका जलाभिषेक करते हैं। दरअसल कांवड़ यात्रा के जरिए दुनिया की हर रचना के लिए जल का महत्व और सृष्टि को रचने वाले शिव के प्रति श्रृद्धा जाहिर की जाती है. उनकी आराधना की जाती है. यानि जल और शिव दोनों की आराधना होती है।


चलिए जानते हैं कांवड़ यात्रा का इतिहास और महत्व

हम बात करें प्राचीन काल के इतिहास की तो कहा जाता है कि पहला कांवड़िया रावण था. वेद कहते हैं कि कांवड़ की परंपरा समुद्र मंथन के समय ही पड़ गई. तब जब मंथन में विष निकला तो संसार इससे त्राहि-त्राहि करने लगा। तब भगवान शिव ने इसे अपने गले में रख लिया. लेकिन इससे शिव के अंदर जो नकारात्मक उर्जा ने जगह बनाई, उसको दूर करने का काम रावण ने किया।

रावण ने तप करने के बाद गंगा के जल से पुरा महादेव मंदिर में भगवान शिव का अभिषेक किया, जिससे शिव इस उर्जा से मुक्त हो गए. बताया जाता है कि अंग्रेजों ने 19वीं सदी की शुरुआत से भारत में कांवड़ यात्रा का जिक्र अपनी किताबों और लेखों में किया है कई पुराने चित्रों में भी ये दिखाया जा चुका है।कांवड़ यात्रा 1960 के दशक में इतने हलचल के साथ से नहीं होती थी। कुछ साधु और श्रृद्धालुओं के साथ धनी मारवाड़ी सेठ नंगे पैर चलकर हरिद्वार या बिहार में सुल्तानगंज तक जाते थे और वहां से गंगाजल लेकर आते थे, जिससे शिव का अभिषेक होता था


कितने कांवड़िए हर साल करते हैं यात्रा

साल 2010 और इसके बाद हर साल करीब 1.2 करोड़ कांवड़िए पवित्र गंगाजल लेने हरिद्वार पहुंचते है, फिर इसे अपने माफिक शिवालयों में लेकर जाते हैं। वहां इस जल से भगवान शिव को पूजा – अर्चना के बीच नहलाते हैं। आमतौर पर कांवड़िए उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, दिल्ली, ओडिसा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड से अब हरिद्वार पहुंचते है।


क्यो कहा जाता है कावड़ यात्रा

कावड़ यात्रा इसलिए कहा जाता है क्योकि इसमें आने वाले श्रृद्धालु बांस की लकड़ी पर दोनों ओर टिकी हुई टोकरियों के साथ पहुंचते हैं और इन्हीं टोकरियों में गंगाजल लेकर वापस आते है। इस कांवड़ को लगातार यात्रा के दौरान अपने कंधे पर रखकर जाते है। इसलिए इस यात्रा कांवड़ यात्रा और यात्रियों को कांवड़िए कहा जाता है। पहले लोग नंगे पैर यात्रा करते थे लेकिन अब नए जमाने के हिसाब से बाइक, ट्रक और दूसरे साधनों का भी उपयोग कर रहे है।

क्या यह जरूरी होता है कि कांवड़ यात्रा में उत्तराखंड से ही गंगाजल लाना होगा

अभी तक लोग उत्तराखंड ही गंगाजल लेने जाते है। मगर अब बिहार, झारखंड और बंगाल या उसके करीब के लोग सुल्तानगंज जाकर गंगाजल लेते हैं और कांवड़ यात्रा करके झारखंड में देवघर के वैद्यनाथ मंदिर या फिर बंगाल के तारकनाथ मंदिर के शिवालयों से लेकर आते है। एक मिनी कांवड़ यात्रा अब इलाहाबाद और बनारस के बीच शुरू हो गई है।

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