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BLOG: ‘सरदार खान’ की भाषा क्यों बोलने लगे हैं कन्हैया कुमार?

सचिन झा शेखर का ब्लॉग

BLOG:CPI छोड़कर हाल ही में कांग्रेस (Congress) में शामिल हुए कन्हैया कुमार (Kanhaiya Kumar) बिहार विधानसभा उपचुनाव (Bihar assembly by-election) में प्रचार करने पहुंचे हैं। 9 फरवरी 2016 की घटना के बाद जो भी अमृत था वो कन्हैया के हिस्से आया और जो भी विष था वो उमर खालिद और अन्य उठाते रहे हैं। हालांकि ये बहस का अलग मुद्दा है।

कन्हैया को देश की जनता, मीडिया और सभी गैर बीजेपी गैरराजनीतिक दलों ने भरपूर प्यार दिया। लालू प्रसाद के साथ रिश्ते खराब होने पर भोगेंद्र झा (Bhogendra Jha) का टिकट काट लेने वाली सीपीआई ने लालू प्रसाद की परवाह किए बिना उन्हें बेगूसराय (Begusarai) से चुनाव में उतारा और देश भर से लोगों ने उन्हें मदद भी की। हालांकि वो एक औसत उम्मीदवार की तरह लगभग 4 लाख मतों से चुनाव हार गए।

चुनाव में हारने पर पार्टी की तरफ से कार्रवाई की जाती रही है, लेकिन उल्टे उन्होंने पार्टी पर ही कार्रवाई कर दी। सीपीआई को छोड़कर कांग्रेस में चले गए। कांग्रेस में जाने के बाद कन्हैया कुमार अपने दो साथी को लेकर पटना पहुंचे। लेकिन डॉक्टर कन्हैया कुमार से कांग्रेस में जाने के बाद जिस विनम्रता की उम्मीद की जानी चाहिए थी, उसके विपरित वो फिल्म ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ के सरदार खान की भाषा में मनोज झा से सवाल करने लगे कि ड्राइंग रूम में अपने आका से पूछिएगा कौन हैं भक्त चरण दास?

कन्हैया कुमार ने एक झटके में ही पूरे समाजवादी आंदोलन पर ही सवाल खड़ा कर दिया। उनके अनुसार 30 साल में जदयू और राजद की सरकार ने कुछ भी नहीं किया। बीजेपी जैसे दलों से लड़ने के लिए कन्हैया भी ऐसे तथ्यों का प्रयोग कर रहे हैं जो अर्धसत्य है। जिस अर्धसत्य के दम पर बीजेपी आईटी सेल विरोधियों पर हमलावर रही है।

डंके की चोट पर कन्हैया सवाल कर रहे हैं कि कांग्रेस छोड़कर कौन सी ऐसी पार्टी है जिसने भाजपा से हाथ नहीं मिलाया? यह अर्धसत्य है। यह बात सही है कि लालू प्रसाद की पहली सरकार को बीजेपी ने बाहर से समर्थन दिया था लेकिन उस सरकार में कोई भी बीजेपी का नेता राज्य सरकार में शामिल नहीं था। उसी सरकार ने आडवाणी को गिरफ्तार किया था। अगर ऐसे ही वो सवाल उठाएंगे तब तो नेहरु ही धर्म संकट में फस जाएंगे। आजाद भारत में बनी पहली सरकार में श्यामा प्रसाद मुखर्जी नेहरु मंत्रीमंडल के सदस्य थे। ऐसे में अगर ‘पढ़ा लिखा लठैत’ पलटवार कर दे तो आपका क्या जवाब होगा?

हैरत की बात है कि जेएनयू से पढ़ा लिखा एक युवक परसेप्शन की राजनीति करने लगा है। बिना किसी फैक्ट के वो यह कह दे रहा है कि एक पार्टी कोना-कोना खेल रही है बीजेपी के साथ। कन्हैया उस पार्टी पर आरोप लगा रहे हैं जिसे दुनिया देख रही है कि वो पिछले 30 साल से सबसे अधिक हमलावर रही है आरएसएस बीजेपी पर।

राजनीतिक इतिहास महीनों और घंटों में नहीं लिखे जाते हैं। इसके लिए वर्षों का इंतजार करना होता है। भाषा की मर्यादा को बनाए रखकर राज्य सभा में जिस तरह से मनोज झा बीजेपी पर हमलावर रहे हैं, कम से कम इस मर्यादा का पालन तो डॉक्टर कन्हैया कुमार भी कर ही सकते है। जिस कांग्रेस पार्टी के सदस्य कन्हैया आज बने हैं उस पार्टी के कद्दावर नेता मनोज झा के चाचा रमेश झा रह चुके हैं।

मनोज झा ने उस दौर में राजद को चुना जब बिहार की एक बहुत बड़ी आबादी लालू प्रसाद और उनकी पार्टी को अछूत की तरह देखती थी। मीडिया में राजद का हस्तक्षेप या जगह शून्य के बराबर था। भागलपुर दंगों को लेकर मनोज झा ने जितनी लड़ाई लड़ीं वो बातें पब्लिक डोमेन में है। कन्हैया को भक्त चरण दास की भक्ति से पहले यह भी जानना चाहिए था कि वो जैसे यूनिवर्सिटी के छात्र होने पर गर्व करते हैं, वैसे ही यूनिवर्सिटी में मनोज झा अध्यापक हैं। राजनीति के मैदान में भी दोनों की ही तुलना वैसी ही है।

कमजोर सीपीआई को देखकर कांग्रेस का दामन थामने वाले कन्हैया यह नहीं बता रहे हैं कि उनके पास कांग्रेस के लिए क्या रोड मैप है? शायद वो भूल गए हैं कि पिछले 5-6 लोकसभा चुनावों के पैटर्न को देखा जाए तो बिहार में किसी भी समीकरण में यह दम नहीं है कि राजद और बीजेपी को साइड कर राज्य में 30 लोकसभा सीटें निकाल लें। फिर किस समीकरण के सहारे वो आगे बढ़ेंगे?

कन्हैया कुमार को समझना होगा कि चुनावी राजनीति शब्दों के खेल से आगे की बात होती है। खासकर 1990 के बाद से देश की राजनीति ने ऐसी करवट ली है कि कोई भी दल इस बात को लेकर दावा नहीं कर सकता कि वो गठबंधन राजनीति से बाहर निकल चुका है। सरदार खान के अंदाज में डायलॉग बोलकर आप अपने समर्थकों को उत्साहित कर सकते हैं लेकिन नए लोगों को अपने साथ नहीं जोड़ सकते हैं। बिहार की राजनीति में एक झटके में सामाजिक समीकरण को नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं। लालू प्रसाद, मनोज झा की कुर्बानी को आप जीरो बताकर नई राजनीतिक विकल्प बीजेपी के खिलाफ कैसे खड़ा कर सकते हैं?

(लेखक: सचिन झा शेखर जाने-माने पत्रकार हैं। राजनीति और पर्यावरण के मुद्दों पर लिखते रहे हैं। बिहार की राजनीति पर मजबूत पकड़ रखते हैं।)

(डिस्क्लेमर :इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति APN न्यूज उत्तरदायी नहीं है)

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