गूगल पर सर्च किया जा रहा है ओलंपिक खिलाड़ियों की जाति, टॉप पर पी. वी सिंधु, अनुच्छेद 15 भेदभाव की नहीं देता इजाजत

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खेलों का महाकुंभ टोक्यो ओलंपिक संपन्न हो चुका है। इस बार भारत को एक सोना भी मिल गया। टोक्यो ओलंपिक में भारत ने 7 पदक हासिल किए जिसमें एक गोल्ड है 2 सिल्वर है और 4 ब्रॉन्ज मेडल है। देशभर में खिलाड़ियों की वाहवाही हो रही है वहीं कई लोग खिलाडियों की जाति खोजने में व्यस्त हैं।

ओलंपिक में झंड़ा गाड़ने वाले खिलाड़ियों की जाति खोजी जा रही है। इससे साफ पता चलता है कि देश ने कितनी भी तरक्की क्यों न कर ली हो लेकिन जाति का बुखार नहीं उतरा है।

ओलंपिक में मेडल जीतने वाली सबसे अधिक जाति पी. वी सिंधु की खोजी गई है। 25 जुलाई से लेकर 1 अगस्त के बीच गूगल पर सबसे अधिक पी. वी सिंधु की जाति को खोजा गया है।

बता दें कि गूगल ट्रेंड में 1 अगस्त को पी.वी सिंधु कास्ट कीवर्ड सबसे ऊपर रहा। इसी दिन सिंधु ने कांस्य पदक हासिल किया था। भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी पी.वी सिंधु के बाद बॉक्सर लवलीना बोरगोहने की जाति को सबसे अधिक खोजा गया है।

आम तौर पर किसी भी देश का कोई भी खिलाड़ी जब ओलंपिक में जाता है तो लोग मेडल के बारे में सर्च करते हैं उसके कामयाबी के बार में सर्च करते हैं लेकिन भारत में सबसे अधिक महत्व जाति को दिया जाता है। भारतीयों पर जाति का बुखार किस तरह से चढ़ा हुआ है आप इस बात से अंदाजा लगा सकते है कि, भारतीय महिला हॉकी टीम की खिलाड़ी वंदना कटारिया को हार के बाद अपमान का सामना करना पड़ा था।

टीम के हारने के बाद हरिद्वार स्थित उनके घर के बाहर लोगों ने जाति सूचक शब्द का प्रयोग किया साथ ही उनके घर के बाहर पटाखे भी फोड़े लोगों ने हार का ठिकरा वंदना पर फोड़ दिया।

देश में जाति विवाद नया नहीं है यह पहली बार नहीं हो रहा है कि जब किसी खिलाड़ी की जाति को इंटरनेट पर सर्च किया जा रहा हो या फिर उसे अपनी जाति के कारण अपमान सहना पड़ा हो, इससे पहले साल 2018 में भारतीय एथलीट हीमा दास ने वर्ल्ड अंडर 20 चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल हासिल किया था तब लोगों ने उनकी जाति को भी खूब गूगल पर सर्च किया था।

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भारतीय क्रिकेटर खिलाड़ी संजू सैमसन की जाती को इंटरनेट पर सबसे अधिक बार सर्च किया जाता है। आंकड़ों की माने तो संजू सैमसन की जाति पिछले एक सालों में 7 बार टॉप ट्रेंड पर थी।

संविधान के अनुच्छेद 15 के अनुसार राज्य के द्वारा धर्म, मूल्य वंश, जाति, लिंग जन्मस्थान को लेकर नागरिकों के साथ किसी भी तरह का भेदभाव नहीं होना चाहिए लेकिन देश में यही तो चलता है। अनुच्छेद 15 संविधान के किसी पन्ने के कोने में दब कर रह गया है जमीनी हकीकत इसके एकदम उलट है।

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