Want create site? Find Free WordPress Themes and plugins.

बीजेपी-शिवसेना के बीच मुख्यमंत्री पद की तल्खी ने 30 साल पुराने रिश्तों को तिलांजलि दे दी है। कांग्रेस-एनसीपी के साथ सरकार बनाने की कवायद में जुटी शिवसेना ने बीजेपी के साथ अपने संबंध-विच्छेद करने का फैसला कर लिया है। यानि, अब शिवसेना के सांसद लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर में एक-दूसरे के खिलाफ वार-पलटवार करते नजर आएंगे। दरअसल, एनसीपी की इस शर्त के बाद कि पहले शिवसेना बीजेपी से अपने संबंध खत्म करे, तभी सरकार बनाने पर विचार हो सकता है। शिवसेना का मुख्यमंत्री बनाने की जुगत में उद्धव ठाकरे ने इस शर्त को स्वीकारते हुए, ये तय कर लिया कि अपने पिता के सपने को पूरा करने के लिए वो कुछ भी करने को तैयार हैं।

चुनाव के नतीजों के बाद से ही मुख्यमंत्री पद की मांग पर अड़ी शिवसेना ने बीजेपी पर वादाखिलाफी का आरोप लगाते हुए अपने रास्ते अलग करने का फैसला कर लिया. इस बात के संकेत तभी से मिलने लगे थे, जब शिवसेना नेताओं की तरफ से बीजेपी के खिलाफ आक्रामक टिप्पणियां मीडिया की सुर्खियां बनने लगीं. बीजेपी को शायद इस बात का भ्रम था कि शिवसेना अपनी विपरीत विचारधारा के लोगों के साथ समझौता कैसे कर सकती है, इसलिए बीजेपी भी देवेन्द्र फड़नवीस को मुख्यमंत्री बनाए जाने की बात पर अड़ी रही।

हालांकि सरकार बनाने का फॉर्मूला कांग्रेस-एनसीपी और शिवसेना ने तैयार कर लिया है। सरकार में किसकी कितनी हिस्सेदारी रहेगी, इसको लेकर तालमेल हो चुका है। लेकिन चर्चा इस बात को लेकर है कि एक-दूसरे के विपरीत चलने वाली विचारधारा के लोगों के बीच, क्या लंबे समय तक तालमेल बना रह पाएगा?  क्या प्रखर हिंदुत्ववादी विचारधारा वाली बाला साहेब ठाकरे की पार्टी शिवसेना, अपनी नीतियों से समझौता कर चुकी है।

खैर, इस बात का पता तो जल्द चल जाएगा। लेकिन सवाल इस बात को लेकर भी उठ रहे हैं कि राजनीतिक दलों के लिए क्या सत्ता से अहम कुछ भी नहीं, सत्ता की खातिर राजनीतिक दलों में दोस्त-दुश्मन में कोई भेद नहीं?

ये सवाल दरअसल इसलिए, क्योंकि हाल के कुछ समय में देश ने ऐसे कई बेमेल गठबंधन देखे है। जो सत्ता की खातिर एक-दूसरे के करीब तो आ गए, लेकिन उनकी ये करीबी ज्यादा दिनों तक देखने को नहीं मिली! उदाहरण के तौर पर देश के सबसे बड़े सूबे, उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा का गठबंधन हो, बिहार में सुशासन बाबू और लालू यादव की दोस्ती हो, जम्मू-कश्मीर में बीजेपी-पीडीपी का गठबंधन हो, या कर्नाटक में कुमारस्वामी और कांग्रेस की दोस्ती, ऐसी दोस्ती ज्यादा दिनों तक चल नहीं पाई।

-अक्षय सिंह गौर

Did you find apk for android? You can find new Free Android Games and apps.