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झारखंड चुनाव से पहले महागठबंधन बिखरा हुआ सा नजर आ रहा है। झारखंड विकास मोर्चा, जेवीएम, और सीपीआई के बागी तेवरों के बाद अब झारखंड मुक्ति मोर्चा, जेएमएम, ने भी सीटों के बंटवारे को लेकर कड़ा रुख अख्तियार कर लिया है। जेएमएम ने कांग्रेस के सामने नया फॉर्मूला रखा है। इसके तहत राज्य की कुल 81 विधानसभा सीटों में से 42 सीटों पर जेएमएम ने खुद लड़ने का ऐलान किया है। जबकि, 39 विधानसभा सीटें बाकी सहयोगी दलों के लिए छोड़ दी है। इसके तहत आरजेडी को सात सीटें, कांग्रेस और वामदलों को 32 सीटें देने का प्रस्ताव है। जेएमएम ने वामदलों को मनाने का जिम्मा कांग्रेस पर छोड़ दिया है।

सूत्रों की मानें तो कांग्रेस झारखंड में 28 सीटों पर और आरजेडी 10 सीटों पर चुनाव लड़ने को लेकर अड़ी हुई है। ऐसे में वामदलों को एक सीट ही मिलती दिख रही है। जबकि, एमएसएस ने दो और सीपीआई माले ने पांच सीटों की डिमांड रखी है।

महागठबंधन सीटों पर सहमति न बनते देख माले ने 16 सीटों पर अकेले ही चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है। कांग्रेस अब भी जेवीएम प्रमुख बाबूलाल मरांडी को महागठबंधन में शामिल कराने के प्रयास में जुटी है। कांग्रेस पहले से तय फॉर्मूले के तहत जेवीएम के लिए सीट छोड़कर बंटवारा करना चाह रही है। जबकि जेएमएम बाबूलाल मरांडी से वार्ता होने तक कांग्रेस, आरजेडी और वामदलों के बीच ही सीटों के बंटवारे के लिए राजी है।

कांग्रेस और जेएमएम के बीच मुख्यरूप से आदिवासी समुदाय की 28 सुरक्षित सीटों के बंटवारे को लेकर भी पेंच फंसा है। हेमंत सोरेन कांग्रेस को चार से अधिक आदिवासी सीटें नहीं देना चाहते हैं जबकि, कांग्रेस छह सीटें मांग रही है। कांग्रेस अपने बड़े आदिवासी नेताओं को चुनावी मैदान में उतारना चाहती है, जिसके लिए आदिवासियों के लिए आरक्षित सीटें मांग रही है। सभी दल अपनी-अपनी बात पर अड़े हुए हैं। ऐसे में झारखंड विधानसभा चुनाव की सियासी जंग में उतरने से पहले ही महागठबंधन बिखरता हुआ नजर आ रहा है।

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