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भारतीय फिल्म जगत की जानी-मानी अभिनेत्री और दो बार सांसद रह चुकी जयाप्रदा को अबकी बार बीजेपी ने अपने पार्टी से आजम खांन के विपरीत उतारा है, बता दे कि जयाप्रदा इससे पहले भी रामपुर सीट समाजवादी पार्टी से दो बार 2004 और 2009 में सांसद रह चुकी है और दोनों ही बार जया ने यहां से कांग्रेस की बेगमनूर को हटाया था, लेकिन अबकी बार ये मुकाबला दिलचस्प इसलिए भी होगा क्यों की समाजवादी पार्टी से रामपुर सीट पर अबकी बार आजम खान है, यहां ये देखना खास होगा की रामपुर की जनता मोदी लहर के साथ अपने पूर्व सांसद को चुनती है, या फिर वहां के विकास कर्ता कहे जाने वाले आजम खान को ये देखने वाली बात होगी।

वही रामपुर से 2014 के बीजेपी के जीते हुए सांसद की नेपाल सिंह की तबीयत अस्वस्थ होने के चलते भी बीजेपी को रामपुर से उम्मीदवार बदलने की जरूरत पड़ी। साथ ही समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता आजम खान को उनके गढ़ में ही घेरने के लिए मजबूत और रामपुर के नब्जों को समझने वाले उम्मीदवार को उतारने की चुनौता थी। शायद यहीं वजह है कि बीजेपी में जया को पार्टी में शामिल कर रामपुर सीट से उतारने का शीर्ष नेतृत्व ने निर्णय लिया है।

रामपुर की मौजूदा हालत

रामपुर जिले में घुसते ही आपको लगेगा की आप किसी अच्छे शहर में है, टूटी-फूटी सड़के अचानक ही साफ-सुथरी हो जाती है, साथ ही साथ चौड़ी सड़को के साथ डिवाइडर पर खिलते हुए रंग दिखाई देने लगेगे, वही इनका साथ देती खुबसूरत लाइटें भी आंखों को सुकून देती दिखेगी। सड़को के किनारें बैठने को बेंच और हर तरफ साफ-सफाई, ये देन कहीं न कहीं आजम खान की ही कहीं जाती है। लेकिन इन सब के बाद भी ये खुबसूरती काम नही आती, क्यो कि चौड़ी सड़के किसी का पेट नहीं भरती।

रामपुर और भैसों का कनेक्शन

रामपुर में जयाप्रदा के बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ने के साथ ही यहां के नाम पर एक और बात बहुत फेमस है, जो की शायद भारत की जनता को हमेशा याद रहेगी, वो है आजम की भैंसो का खोना और उन्हें ढ़ुढ़ने के लिए सूबे की पुलिस की तत्परता, लेकिन इसके अलावा यहां की सड़कों पर घूमती भैसों को उन भैंसों के बारे में पता हों जिन्हें चोरी होने के 24 घंटे के अंदर खोज लिया गया था, अब यहां बात ये उठती है कि काश यूपी जनता भी इतनी ही बेखौफ हो पाती।

रामपुर और जौहर युनिवर्सिटी

रामपुर में बनी मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी को लेकर भी एक समय जमकर विवाद हुआ, बता दे कि 2004 में इसका प्रस्ताव सरकारी उर्दू यूनिवर्सिटी के तौर पर आया, लेकिन आजम खान के लाइफ-टाइम चांसलर होने की बात कांग्रेस सरकार को खटकने लगीं। वही इस मामले पर आजम खान भी पीछे हटने को तैयार नही थें, जिसके चलते मामला लटक गया। वही 2007 में जब यूपी की कमान मायावती के हाथों आयी तो ये मामला और भी ठप पड़ गया, 2012 में सपा के सत्ता में आते ही इस विश्वविद्यालय का काम चल निकला।

जया और राजनीति

साल 1994 में जयप्रदा ने अपने राजनीतिक पारी की शुरूआत साल 1994 में आंध्र प्रदेश की तेलगु देशम पार्टी से की थी उस वक्त वहां के पूर्व मुख्यमंत्री एन टी रामाराव थे। जिसके बाद 1996 में जया आंध्र प्रदेश से राज्यसभा में पहुंची, जिसके बाद जया के चंद्रबाबू नायडू से मतभेद हो गये और जया ने आंध्रा छोड़कर समाजवादी पार्टी का हाथ थामा। वही जब मुलायम और अमर सिंह के बीच विवाद हुआ तो वे बीजेपी में आ गयी।

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