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न्यायपालिका और कार्यपालिका हमेशा ही आपसी सामंजस्य बैठा कर चलती है। लेकिन कभी-कभी कुछ मसलों पर दोनों में टकराव देखने को मिलता है। ऐसे में कार्यपालिका कभी न्यायपालिका को उनका दायरा समझाती है तो कभी न्यायपालिका कार्यपालिका को उनके कामों को याद दिलाती है। ऐस में स्वतंत्रता दिवस  समारोह में भाषण देते हुए केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि हम पीआईएल का सम्मान करते हैं, लेकिन, अदालत को उनको अपना काम करते रहने देना चाहिए जो चुनी हुई सरकार में बैठे हैं या चुनकर आए हैं। कोर्ट को जब दखल देना चाहिए जब वह कुछ गलत करें।

ऐसे में अब सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को सवाल किया कि कोर्ट को उस समय क्या करना चाहिए, जब कार्यपालिका काम न कर रही हो और सरकार की निष्क्रियता की वजह से नागरिकों के अधिकारों का हनन हो रहा हो। कानून मंत्री की टिप्पणी पर सीधा कमेंट करने से बचते हुए जस्टिस लोकुर ने कहा, ‘हमें बताया गया है कि गवर्नेंस का काम सरकार का है और इसमें हम कुछ नहीं कर सकते, लेकिन यहां कोई गवर्नेंस नहीं है। ऐसी स्थिति में हमें क्या करना चाहिए।’

बता दें कि स्वतंत्रता दिवस के दिन मुख्य न्यायाधीश ने भी रविशंकर प्रसाद के बयान पर जवाब देते हुए कहा था कि मैं कानून मंत्री की बातों से सहमत नहीं हू्ं। जिन लोगों ने आजादी की लडाई लड़ी उन्होंने आपकी प्रशंसा पाने के लिए ये नहीं किया। वो अपने देश और अधिकारों के लिए लड़े। दरअसल, समारोह की शुरुआत में अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा, कोर्ट में भीड़ बढ़ती जा रही है।  गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट के चार जजों जस्टिस चेलेमेश्वर, जस्टिस गोगोई, जस्टिस लोकुर और जस्टिस कुरियल जोसेफ ने एक प्रेस कॉन्फे्रंस कर सीजेआई पर बेंचों को केस बांटने और पीआईएल सुनने को लेकर कई आरोप लगाए थे।

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