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Dayananda Saraswati की पुण्यतिथि आज, जानिए कैसे हुई थी आर्य समाज के संस्थापक की मौत?

Dayananda Saraswati Death Anniversary: हमारे देश के महान दार्शनिक, सामाजिक नेता और आर्य समाज के संस्थापक Dayananda Saraswati की आज पुण्यतिथि है। उन्होंने मूर्तिपूजा और कर्मकांडों की पूजा का खंडन करते हुए वैदिक विचारधाराओं को पुनर्जीवित करने की दिशा में काम किया था। शनिवार को उनकी पुण्यतिथि पर कई लोगों ने उन्हें याद किया।

उत्‍तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री योगी आादित्‍यनाथ (Yogi Adityanath) ने उन्‍हें श्रद्धांजलि देते हुए ट्वीट किया, ”महान सनातन संस्कृति की पावन संत परंपरा के अतुल्य प्रतिनिधि, आर्य समाज के संस्थापक, अद्भुत सामाजिक व आध्यात्मिक चिंतक, प्रतिबद्ध समाज सुधारक महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी की पुण्यतिथि पर विनम्र श्रद्धांजलि। प्रगतिशील एवं समतामूलक समाज के निर्माण में आपका योगदान अविस्मरणीय है।”

मध्‍यप्रदेश के मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह चौहान (Shivraj Singh Chauhan) ने स्वामी दयानन्द सरस्वती की पुण्यतिथि पर उन्‍हें याद करते हुए ट्वीटर पर लिखा, ”दुनिया को अपना सर्वश्रेष्ठ दीजिये और आपके पास सर्वश्रेष्ठ लौटकर आयेगा-स्वामी दयानन्द सरस्वती आर्य समाज के संस्थापक, वेदों के प्रकांड ज्ञाता, महान आध्यात्मिक संत, स्वामी दयानंद सरस्वती जी की पुण्यतिथि पर विनम्र श्रद्धांजलि।”

स्‍वामी दयानन्द सरस्वती की पुण्यतिथि पर मध्‍यप्रदेश के गृहमंत्री नरोत्‍तम मिश्रा ने लिखा, ”स्वामी दयानंद सरस्वती जी ने प्रवचनों के माध्यम से भारतवासियों को राष्ट्रीयता का उपदेश दिया और भारतीयों को देश पर मर मिटने के लिए हमेशा प्रेरित करते रहे। उनकी पुण्यतिथि पर शत-शत नमन और विनम्र श्रद्धांजलि। #SwamiDayanandSaraswati

कैसे हुई स्‍वामी दयानन्द सरस्वती की मौत?

1883 में जोधपुर के महाराजा जसवंत सिंह द्वितीय ने स्‍वामी दयानंद को अपने महल में रहने के लिए आमंत्रित किया। महाराजा स्‍वामी दयानंद के शिष्य बनने के लिए उत्सुक थे। स्‍वामी दयानंद अपने प्रवास के दौरान महाराजा के शौचालय में गए और उन्हें नन्ही जान नाम की एक नृत्यांगना के साथ देखा। उन्‍होंने महाराजा से कहा कि वे लड़की और सभी अनैतिक कार्यों को त्याग दें और एक सच्चे आर्य की तरह धर्म का पालन करें। स्‍वामी दयानंद के सुझाव ने नन्ही को नाराज कर दिया, जिसका उसने बदला लेने का फैसला किया।

29 सितंबर 1883 को नन्ही ने स्‍वामी दयानंद के रसोइए जगन्नाथ को रात को दूध में कांच के छोटे टुकड़े मिलाने के लिए रिश्वत दी। स्‍वामी दयानंद के सोने से पहले उन्‍हें गिलास से भरा दूध परोसा गया, जिसे उन्होंने तुरंत पी लिया। जिसके बाद वे कई दिनों तक बिस्तर पर पड़े रहे और असहनीय दर्द को सहते रहे। इसके बाद महाराजा ने शीघ्र ही उनके लिए चिकित्सा की व्यवस्था की। हालांकि जब तक डॉक्टर पहुंचे तब तक उनकी हालत खराब हो चुकी थी। स्‍वामी दयानंद की पीड़ा को देखकर जगन्नाथ अपराधबोध से अभिभूत हो गया और उसने दयानंद के सामने अपना अपराध स्वीकार कर लिया। अपनी मृत्युशय्या पर स्‍वामी दयानन्द ने उसे क्षमा कर दिया और उसे पैसे का एक थैला दिया यह कहते हुए कि वह महाराजा के आदमियों द्वारा खोजे जाने और मार डालने से पहले राज्य से भाग जाए।

बाद में महाराजा नेस् ‍वामी दयानन्द को माउंट आबू भेजने की व्यवस्था की हालांकि माउंट आबू में कुछ समय रहने के बाद 26 अक्टूबर 1883 को उन्हें बेहतर चिकित्सा देखभाल के लिए अजमेर भेज दिया गया। उनके स्वास्थ्य में कोई सुधार नहीं हुआ और 30 अक्टूबर 1883 को दीपावली की सुबह मंत्रों का जाप करते हुए उनका निधन हो गया।

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